कभी मोटर मेकेनिक हुआ करते थे गुलज़ार
- प्रदीप सरदाना वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्म समीक्षक कोई होता जिसको अपना कह लेते यारो , मुसाफिर हूँ यारो , तेरे बिना जिंदगी से , तुम आ गए हो , ए जिंदगी गले लगा ले , हुज़ूर इस कदर , बीड़ी जलाइयके , कजरारे कजरारे और दिल तो बच्चा है जैसे कितने ही खूबसूरत गीतों के गीतकार और जाने माने फ़िल्मकार आज 87 बरस के हो गए हैं। फिल्मों के अलावा जब भी अच्छी और लोकप्रिय शायरी की बात आती है तो उसमें भी गुलज़ार का नाम काफी ऊपर आता है। गुलज़ार आज फिल्म उद्योग की ऐसी हस्ती हैं जिनको सभी दिल से सम्मान देते हैं। लेकिन कभी यही गुलज़ार मुंबई की एक गैराज में मोटर मेकेनिक हुआ करते थे। गुलज़ार ने फिल्मों को सजाने से पहले ऐसी कितनी ही कारों को अपने ब्रश और हुनर से सजाया , जो दुर्घटना में टूट फूट जाती थीं। गुलज़ार उन कारों की डैंटिंग-पेंटिंग करके संवार देते थे। 18 अगस्त 1934 को पाकिस्तान के झेलम जिले में एक सिख परिवार में जन्मे गुलज़ार का असली नाम सम्पूर्ण सिंह कालरा है। लेकिन साहित्य और शायरी में उनकी दिलचस्पी देखते हुए उनके पिता ने उनका नाम गुलज़ार रख दिया। जो पिछले करीब 60 बरसों से अपनी बहुमुखी प्रति...