‘मेला’ फिल्म के 50 साल- जब मेले में खोते थे दो भाई
- प्रदीप सरदाना वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्म समीक्षक हिन्दी सिनेमा की जब भी चर्चा होती है तो 1970 के दशक की फिल्मों को खूबसूरती से याद किया जाता है।जब हिन्दी फिल्में अपने परंपरागत रूप से हटकर एक नए युग में प्रवेश कर रही थीं। तभी 30 जून 1971 को प्रदर्शित हुई थी ‘ मेला ’ ने सफलता के परचम लहरा दिये थे। आज ‘ मेला ’ को रिलीज हुए 50 साल हो चले हैं। लेकिन इस फिल्म की सफलता की गूंज अभी तक बरकरार है। ‘ मेला ’ फिल्म अपनी कुछ खास बातों के लिए भी याद की जाती है। यह प्रकाश मेहरा जैसे दिग्गज फ़िल्मकार की ‘ हसीना मान जाएगी ’ के बाद दूसरी निर्देशित फिल्म थी। फिर यूं तो फिल्मों के खोया पाया जैसे सुपर हिट फॉर्मूले पर पहले भी कुछ फिल्म बन चुकी थीं। लेकिन 1970 के बाद जिन फिल्मों ने दो भाइयों के बिछुड़ने और फिर मिलने के फॉर्मूले को प्रचलन बना दिया , उनमें यह फिल्म अहम है। फिल्म का नाम ‘ मेला ’ भी इसलिए है कि बचपन में मेले में दो भाई बिछुड़ जाते हैं। बड़े होने पर ये एक दूसरे के खून के प्यासे बनते हैं। लेकिन अंत में डाकू शक्ति सिंह को कन्हैया की बाजू पर बने सूर्य के निशान से पता लगता है कि यह तो ...