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पदमश्री ना मिलने का मलाल रहा ऋषि कपूर को

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ऋषि कपूर के जन्म दिवस 4 सितंबर पर विशेष  - प्रदीप सरदाना   वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्म समीक्षक   ऋषि कपूर ने अपने करियर में अलग अलग रंगों की भूमिकाएँ करके सभी को हैरान कर दिया था। जबकि ऋषि की हीरो के रूप में 1973 में आई पहली फिल्म ‘ बॉबी ’ से , उंनकी पहचान एक चॉकलेटी हीरो के रूप में बनी। तब ऋषि 21 साल के थे। उनके पिता राज कपूर ने उन्हें लॉंच किया था। इसलिए कुछ लोगों का कहना था कि ऋषि ज्यादा नहीं चलेगा। यह तो राज कपूर के बेटे होने के कारण उसे फिल्में मिल रही हैं। लेकिन ऋषि ने करीब 50 बरसों तक बॉलीवुड पर अपने अभिनय की ऐसी चमक बिखेरी की उसकी दमक हमेशा बरकरार रहेगी। हमारे यहाँ ऐसे कम ही अभिनेता हैं जिन्हें ऋषि कपूर जैसी विभिन्न फिल्में मिलीं। यूं ऋषि ने पहली बार कैमरे का सामना 3 बरस की उम्र में ही कर लिया था। जब ‘ श्री 420 ’ फिल्म के गीत ‘ प्यार हुआ इकरार हुआ ’ में उनको भी रखा गया। चिंटू यानि ऋषि तब कैमरे का सामना करने के मूड में नहीं थे। लेकिन जब राज कपूर ने उन्हें चॉकलेट दी तो वह तैयार हो गए। शायद इसी चॉकलेट  का असर था कि वह बरसों  चॉकलेटी हीरो बने रहे। हालां...

कपूर खानदान का परचम लहरा रहे थे ऋषि कपूर

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-   प्रदीप सरदाना वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्म-टीवी समीक्षक   ऋषि कपूर को दुनिया से विदा हुए आज पूरा एक साल हो गया। पिछले साल कोरोना काल में ही कैंसर से जूझते हुए वह बेशक ज़िंदगी की जंग हार गए थे। लेकिन असल में वह एक बेबाक , ज़िंदादिल और जोशीले इंसान थे। मेरी ऋषि कपूर से कितनी ही मुलाकातें हुईं फोन और व्हाट्सएप पर भी मैं उनसे बात होती रहती थी। उनकी साफ़गोई मुझे हमेशा प्रभावित करती थी। कोई बात उन्हें अच्छी लगती तो वह उसकी खुले दिल से तारीफ करते और यदि कोई बात खराब लगती तो वह उस व्यक्ति के मुंह पर बोल देते थे चाहे वह बात उसे बुरी लगे या उससे उनके रिश्ते खराब हो जाएँ। उधर हम ऋषि कपूर को एक अभिनेता के रूप में देखें तो वह एक ऐसे सफल , लोकप्रिय और बेहतरीन अभिनेता थे , जिनके बल पर कपूर खानदान का परचम लहरा रहा था। वह सिर्फ अपने दादा पृथ्वीराज या पिता राज कपूर का ही नहीं अपने चाचा शम्मी कपूर और शशि कपूर के नाम और उनकी परम्पराओं को आगे बढ़ा रहे थे। जब गत 30 अप्रैल को कपूर खानदान का यह चिराग 67 बरस उम्र में ही बुझ गया तो दुनिया भर में बैठे ऋषि के प्रशंसक अपने आँसू नहीं रोक सके। ऋषि कपूर...

राज कपूर की 'ड्रीम' फिल्म- 'मेरा नाम जोकर' के 50 साल , 'लोकमत समाचार' में 18 दिसम्बर 2020 को प्रकाशित मेरा लेख

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  -  प्रदीप सरदाना  वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्म समीक्षक  भारतीय सिनेमा के इतिहास में ‘ मेरा नाम जोकर ’ एक ऐसी फिल्म है जिसे आज पूरे विश्व में एक कालजयी और भव्य फिल्म के रूप में बहुत सराहा जाता है। लेकिन जब यह फिल्म 18 दिसंबर 1970 को पहली बार प्रदर्शित हुई थी तो दर्शकों ने इसे पूरी तरह नकार दिया था। जबकि राज कपूर ने ‘ मेरा नाम जोकर ’ को कुछ उसी शिद्दत से बनाया था , जैसे के आसिफ ने ‘ मुगल-ए- आजम ’ बनाई थी। लेकिन ‘ मुगल-ए-आजम ’ ने कमाई के मामले में तो सफलता के सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त किए ही , आज भी देश की सबसे खूबसूरत फिल्म के रूप में इसे याद किया जाता है। लेकिन ‘ मेरा नाम जोकर ’ रिलीज के समय ऐसे औंधे मुंह गिरि कि राज कपूर का आरके स्टूडियो और उनका घर ही नहीं उनकी पत्नी कृष्णाराज के गहने तक गिरवी रखने पड़े। राजकपूर आकंठ कर्ज से डूब गए। लोगों ने कहा , अब राज कपूर खत्म , उनका ज़माना गया। इससे राज कपूर का दिल ऐसे ही चकनाचूर हो गया जैसे फिल्म में जोकर राजू का दिल टूटता है लेकिन राज कपूर ने फिर खड़े हुए और ‘ बॉबी ’ बनाकर फिर वैसी सफलता पाई , जिसके लिए वह जाने जाते थे।...