भारत ही नहीं विश्व आराध्य हैं भगवान श्रीराम
- प्रदीप सरदाना
वरिष्ठ पत्रकार एवं विश्लेषक
विजयदशमी-दीपावली के ये प्राचीन संदेश
यूं तो सदा ही प्रासंगिक रहे हैं । हर समय ऐसे
असंख्य उदाहरण मिल जाएँगे जब सत्य पर असत्य हावी होता दिखाई देता है, लेकिन तभी कुछ न कुछ ऐसा घटित होता है कि अंत
में सत्य ही जीतता है। लेकिन इस बार यह सदेश और भी अहम है। क्योंकि इस बार कोरोना रूपी
राक्षस पूरे विश्व में नित हजारों ज़िंदगियों को काल का ग्रास बना रहा है। ऐसे में इस संदेश से सभी को बल मिलता है उम्मीद बंधती है कि कोरोना का अंत होकर रहेगा।
हम निश्चय ही जल्द इस रावण, इस बुराई को नष्ट करने में सफल होंगे
और अंधकार को चीरते हुए प्रकाश में पहुंचेंगे।
विजयदशमी और दीपावली दोनों महापर्व भगवान राम से जुड़े हैं। इसलिए इस वर्ष यह विजयदशमी और दीपावली और भी महत्व की हैं। क्योंकि इस बार करीब
500 वर्ष के लंबे संघर्ष के बाद राम जन्म भूमि अयोध्या में भी असत्य पर संवैधानिक विजय
प्राप्त हुई है। उस विजय के बाद अब अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण का सपना सच
होने जा रहा है। इस बार जब हम विजयदशमी और दीवाली मना रहे हैं, तब अयोध्या में भव्य राम मंदिर कार्य आरंभ हो
चुका है। इससे देश भर में ही नहीं पूरे विश्व में फैले राम भक्तों के हृदय में अनुपम
सुखद अनुभूति है।
राम मंदिर शिलान्यास के वे ऐतिहासिक पल
अयोध्या में राम मंदिर भूमि पूजन के दौरान गत 5 अगस्त को किस तरह देश राम मय हुआ वह नज़ारा भी सभी ने देखा ही था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस भक्तिभाव और विधिविधान पूजा के साथ भूमि पूजन कर रहे थे, वे दृश्य सदा के लिए मस्तिक पटल पर अंकित हो गए हैं। यह पहला मौका था जब इस समारोह की कवरेज के दौरान देश के लगभग तमाम बड़े न्यूज़ चैनल्स, धार्मिक चैनल्स के रूप में प्रतीत हो रहे थे। जो तड़के-सुबह से दोपहर बाद तक लगातार इस धार्मिक आयोजन की विश्वव्यापी कवरेज देते रहे।
हालांकि कोरोना महामारी के
चलते इस ऐतिहासिक और भव्य समारोह में सिर्फ करीब 200 अतिथियों को आमंत्रित किया
गया था। लेकिन मीडिया के बीच इसे कवर करने के लिए ऐसी मारामारी थी कि मीडिया
संस्थानों के मशहूर बड़े संवाददाता ही नहीं कई संपादक तक, चार दिन पहले ही अयोध्या पहुँच गए थे। किसी
धार्मिक आयोजन की ऐसी महा कवरेज इससे पहले कभी देखने को नहीं मिली।
आखिर यह मौका भी इतना बड़ा था
कि इस घड़ी का इंतज़ार करीब पाँच सदियों से था। पिछले तीस बरसों से तो ‘राम मंदिर’ निर्माण का
मामला एक बड़े आंदोलन के रूप में चल रहा था। जिसके लिए कितने ही लोग अपने जीवन की आहूति दे चुके थे। इसलिए अब मोदी राज में यह
पावन घड़ी आई तो हर कोई राम मंदिर शिलान्यास को अपनी आँखों से देखने को लालायित था।
इस बात की तो बेहद खुशी थी ही
कि लगभग 500 साल बाद अंततः राम मंदिर के लिए शिलान्यास हो रहा है। लेकिन यह खुशी
तब और भी बढ़ गयी जब ये काज देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों सम्पन्न
हुआ। वह भी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी की देखरेख में। साथ ही
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत और रामजन्म भूमि न्यास के अध्यक्ष
महंत नृत्य गोपालदास जैसी विभूतियों की मौजूदगी में।
राजनीति
ही नहीं धर्म के भी विशेषज्ञ मोदी
प्रधानमंत्री मोदी धर्मशास्त्रों
के प्रकांड ज्ञाता हैं, इस बात की
मिसाल पहले भी कुछ मौकों पर मिल चुकी है। धर्म के प्रति उनकी गहन आस्था भी
सर्वविदित है। यूं राममंदिर के भाजपा आंदोलन से भी मोदी शुरू से ही जुड़े हैं।
लेकिन केदारनाथ क्षेत्र में अपनी बरसों की साधना-तपस्या के कारण उनकी पहचान शिव
भक्त के रूप में अधिक रही है। फिर साल में दो बार नवरात्र के दिनों में, जिस तरह मोदी जी सिर्फ नीबू पानी पीकर 9 दिन का उपवास रखते हैं, उससे पता लगता है कि माँ दुर्गा
के भी वह बड़े उपासक हैं। लेकिन राम मंदिर शिलान्यास के दौरान नरेंद्र मोदी ने यह
भी बता दिया कि वह भगवान राम के भी परम भक्त ही नहीं उनको लेकर इतना ज्ञान रखते
हैं कि कोई अन्य राजनेता उनके दूर दूर तक नहीं ठहरता। वह राजनीति के ही नहीं धर्म
के भी महान विशेषज्ञ हैं। ।
प्रधानमंत्री मोदी ने भूमि
पूजन के दौरान एक सामान्य भक्त के समान हनुमान जी और राम लला की आराधना तो की ही।
साथ ही राम लला के सामने जिस तरह वह पूरी तरह दंडवत होकर नतमस्तक हुए वह दृश्य तो
सभी के दिलों में घर कर गया। लेकिन भूमि पूजन के बाद अपने सम्बोधन में भगवान राम
और रामायण को लेकर मोदी ने जो अपनी बातें कहीं उनका तो कोई सानी ही नहीं है। बड़ी
बात यह भी थी कि उन्होंने वे तमाम बातें किसी लिखित भाषण से प्रस्तुत नहीं कीं।
उनको सब कुछ कंठस्थ था। धर्म के प्रति इतना परम ज्ञान अब से पहले किसी भी भारतीय
प्रधानमंत्री में नहीं देखा गया।
अब जय सियाराम क्यों
इसके अलावा मोदी ने जिस तरह
राम की व्याख्या की उससे स्पष्ट हो गया कि राम सिर्फ किसी एक धर्म, एक राज्य या एक देश के नहीं। ‘राम सबके हैं, राम सब में हैं’।
राम को लेकर अनुपम व्याख्या
मोदी के शब्दों की बानगी देखते ही बनती है -‘’भारत की आस्था में राम हैं, भारत के आदर्शों में राम हैं। हजारों साल पहले वाल्मीकि रामायण में जो राम प्राचीन भारत का पथ प्रदर्शन कर रहे थे, जो राम मध्य युग में तुलसी, कबीर और नानक के जरिये भारत को बल देरहे थे। वही राम आज़ादी की लड़ाई के समय बापू के भजनों में शक्ति बनकर मौजूद थे।‘’
मोदी ने राम की पूरे भारत में
सर्वव्यापता की एक मिसाल यह भी दी कि ‘रामायण’ तमिल में ‘कंब रामायण’ के नाम से प्रचलित है तो तेलुगू में रघुनाथ और रंगनाथ रामायण है। वहीं
उडिया में ‘रुईपाद कातेड़पदी’ रामायण है
तो कन्नड में ‘कुमुदेन्दु’ रामायण है।
ऐसे ही कश्मीर में रामावतार चरित मिलेगा तो मलयालम में रामचरित और बांग्ला में ‘कृतिवास रामायण’ है। गुरु गोविंद सिंह ने तो तो खुद ‘गोबिन्द रामायण’ लिखी।“ जो यह बताता ही राम सभी युग
में हैं।
प्रधानमंत्री मोदी की ये सब बातें जहां उनके राम ज्ञान को प्रस्तुत करती हैं वहाँ बताती हैं कि प्राचीन काल से ही लगभग पूरे संसार में राम किसी न किसी रूप में विधमान हैं।
- प्रदीप सरदाना
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार, समीक्षक एवं टीवी पैनलिस्ट हैं )






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