कृषि सुधारों से किसानों को मिलेगी खुशहाली



-प्रदीप सरदाना 

यह निश्चय ही किसी आश्चर्य से कम नहीं कि केंद्र सरकार किसानों के बड़े हित में संसद में बिल पारित करे और किसान उसका विरोध करें। इन बिलों के खिलाफ देश के कुछ किसान संगठन जिस तरह हो हल्ला कर रहे है, वह सब काफी दुखदायी है। जब कि ये वही बिल हैं जो किसानों की आय बढ़ाएंगे और उनके उत्पादों के लिये बाजार ओर भी बड़ा हो जाएगा।

इसके बावजूद इन बिलों के पास होने पर खासतौर से पंजाब और  हरियाणा में जिस प्रकार विरोध हो रहा है, वह सब बताता है कि कुछ राजनैतिक दल और कुछ संगठन नहीं चाहते कि किसानों का भला हो और उन्हें अपनी मेहनत का अच्छा फल मिले। असल में कांग्रेस और अकाली दल जैसे कुछ दलों ने कुछ किसानों के मन में यह डर फैला दिया है कि ये कृषि सुधार विधेयक कृषि क्षेत्र को कॉर्पोरेट के हाथ में सौंप देंगेजबकि सच्चाई यह है कि किसानों की बरसों से चली आ रही बेबसी अब दूर होगी और उन्हें अपनी इच्छा से खुले आकाश में, खुले बाज़ार में विचरण करने के सुनहरे मौके मिलेंगे। लेकिन इससे उन राजनैतिक दलों के मंसूबों पर पानी फिर गया है, जो सिर्फ किसानों के हित की बात दिखावे के लिए तो करते हैं लेकिन असल में वे नहीं चाहते कि किसान उनके चंगुल से बाहर निकलें।


यही कारण था जब राज्यसभा में ये बिल पास होने के लिए रखे गए तो कुछ सांसदों ने सभी मर्यादाओं को ताक पर रख जमकर हंगामा किया। यहाँ तक उप सभापति के आसन के समीप पहुँचकर उनका माइक तोड़ डाला
, उनकी मेज पर रखे कागज तक फाड़ डाले। संसद में इस बिल का विरोध करने के लिए कांग्रेस, टीएमसी, वाम दल, समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी ने खूब हंगामा किया। लेकिन टीएमसी के सांसद डेरक ओ ब्रायन और आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने तो हंगामा करते हुए इस दौरान जो सब किया उसे भूलना आसान नहीं होगा।


कृषि सुधार के जो तीन बिल पास हुए हैं उनमें कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक 2020
, कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन एवं कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) हैं।

आश्चर्य यह भी है कि इन किसान हितैषी बिलों को लेकर कुछ विरोधी दल तो विरोध कर ही रहे हैं। लेकिन एनडीए का पुराना  घटक अकाली दल भी इस बिल के विरोध में आ गया और इसके विरोध में एनडीए से अलग भी हो गया। फिर यह भी आज जो कांग्रेस  इन कृषि सुधार बिलों का विरोध कर रही है, अपने शासन में यही कांग्रेस इन बिलों के समर्थन की बात कहती थी। यहाँ तक कांग्रेस के चुनावी घोषणा पत्र में भी इन बिलों को लाने की बात कही हुई है। लेकिन अब राहुल गांधी इसे काला कानून कहकर किसानों को भड़काने में लगे हैं।

यह सही है कि इन बिलों को लेकर पंजाब और हरियाणा के किसानों का एक वर्ग राजनैतिक दलों के बहकावे में आ गया और भाजपा या केंद्र सरकार के मंत्री आदि किसानों को यह समझाने में कुछ चूक कर गए कि ये बिल किस तरह उनकी ज़िंदगी में खुशहाली ला देंगे। हालांकि ये गनीमत है कि किसानों का ये विरोध आंदोलन पंजाब और हरियाणा राज्यों में ही अधिक है। साथ ही किसानों का एक बड़ा वर्ग इन कृषि सुधार बिलों के पास होने पर खुश है और वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसके लिए धन्यवाद भी दे रहे हैं।

जो किसान इन बिलों का विरोध कर रहे हैं उनका मानना है कि इन बिलों के पास होने से अब किसानों की फसलों की सरकारी खरीद नहीं हो सकेगी। साथ ही अब पुरानी चली आ रही मंडियों की व्यवस्था खत्म हो जाएगी और उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ भी नहीं मिलेगा।  

जबकि इस मामले में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड़ड़ा के साथ कृषि मंत्री और यहाँ तक स्वयं प्रधानमंत्री भी सार्वजनिक रूप से बार बार कह चुके हैं कि पुरानी व्यवस्था भी पहले की तरह लागू रहेगी। ये बिल हर प्रकार से किसानों के लिए लाभप्रद हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ट्विटर के अलावा अपने भाषणों में भी इन बिलों को लेकर सब कुछ स्पष्ट शब्दों में बोला है। प्रधानमंत्री का कहना है, ‘’ये कृषि सुधार बिल समय की बड़ी जरूरत हैं। अब तक किसानों के हाथ पाँव बंधे हुए थे। ऐसे गिरोह पैदा हो गए थे जो किसानों की मजबूरी का फायदा उठा रहे थे। लेकिन अब देश के हर किसान को यह आज़ादी है कि वह किसी को भी, कहीं भी अपनी फसल, सब्जी और फल अपनी शर्तों पर बेच सकता है। मंडी में ज्यादा लाभ मिलता ही तो मंडी में या कहीं और ज्यादा लाभ मिलता है तो वहाँ। इससे अब किसानों को बिचौलियों से मुक्ति मिलेगी’’

प्रधानमंत्री ने देश भर के किसानों को आश्वासन देते हुए साफ कहा, मैं सभी किसानों को आश्वस्त करता हूँ कि एमएसपी और सरकारी खरीद की व्यवस्था भी बनी रहेगी। जब देश के प्रधानमंत्री स्वयं किसानों से ये बात कह रहे हैं तो उन्हें प्रधानमंत्री की बात पर पूरा भरोसा करना चाहिए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार, समीक्षक एवं टीवी पैनलिस्ट हैं) 

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