सभी को प्रेरित करती है महाशय धर्मपाल के शून्य से शिखर की यात्रा। मेरा श्रद्धांजलि लेख सुप्रसिद्द दैनिक 'लोकमत समाचार' 4 दिसम्बर 2020 अंक के सभी संस्करण में।

भुलाए नहीं जा सकेंगे महाशय धर्मपाल गुलाटी 


- प्रदीप सरदाना

  वरिष्ठ पत्रकार एवं विश्लेषक  

सुप्रसिद्द उद्योगपति और विश्व के सबसे अधिक उम्र के लोकप्रिय ब्रांड अंबेसडर महाशय धर्मपाल गुलाटी के निधन से एक युग का अंत हो गया। अपनी 98 बरस की उम्र में भी महाशय जी ने अपने व्यापार के साथ समाजसेवा में तल्लीन रहते हुए भी, जिस तरह अपनी ज़िंदगी को भरपूर जिया, वैसी अद्धभुत मिसाल बहुत कम मिलती हैं। मसाला किंग के रूप में मशहूर धर्मपाल ने अपने तीखे मसालों के व्यवसाय के बावजूद असंख्य लोगों की की ज़िंदगी में मिठास भर दी थी। यही कारण है कि इतनी बड़ी उम्र में भी उनके दुनिया से बिदा होने पर सभी गमगीन हैं। 

महाशय धर्मपाल देश के उन गिने चुने लोगों की आखिरी कड़ी के भी मजबूत स्तम्भ थे जिन्होंने स्वतन्त्रता संग्राम और विभाजन की त्रासदी को बहुत करीब से देखा। अविभाजित भारत के सियालकोट में महाशय चुन्नीलाल की 8 संतानों में एक धर्मपाल का जन्म 27 मार्च 1923 को हुआ था। अपने पिता से बड़े लोगों की कहानी सुनने पर धर्मपाल की आँखों में भी एक बड़ा व्यक्ति बनने का  का सपना।

धर्मपाल अभी कक्षा 5 में ही पहुंचे थे कि इसलिए पढ़ाई छोड़ दी कि मास्टर ने  उनकी बाजू पर ज़ोर से नोच दिया था। पिता ने कहा तुम पढ़ाई नहीं कर सकते तो बढ़ई का हुनर सीख लो। वह बढ़ई बन गए लेकिन वहाँ भी मन नहीं लगा। बाद में वह कभी हार्डवेयर तो कभी साबुन, कभी चावल तो कभी कपड़े के काम करते हुए कितने ही काम बदलते रहे। तब पिता ने हारकर अपने मसाले के पुश्तैनी काम में ही धर्मपाल को लगा दिया। जहां उनका ऐसा मन लगा कि उनकी सियालकोट की महाशियां दी हट्टी की देगी मिर्च पूरे शहर में सबसे मशहूर हो गयी। पिता ने उनकी लीलावती से 18 बरस की उम्र में शादी भी कर दी। लेकिन कुछ समय बाद ही देश विभाजन के साथ दंगे भी हो गए। धर्मपाल बड़ी मुश्किल से जान बचाकर परिवार सहित अमृतसर होते हुए दिल्ली पहुंचे।

दिल्ली पहुँचकर इन्हें फिर से शून्य से शुरुआत करनी पड़ी। इसके लिए चाँदनी चौक से 650 रुपए में तांगा खरीदकर वह तांगा चलाने लगे। लेकिन जल्द ही दिल्ली के करोल बाग में फिर से अपने मसालों का कारोबार शुरू कर दिया। बहुत ही छोटी से पूंजी से शुरू हुई उनकी महाशियां दी हट्टी’, एमडीएच-असली मसाले सच सच के रूप में पहले देश में और फिर विदेश में इतनी मशहूर हुई कि आज भी उनका कोई सानी नहीं है। आज 100 से अधिक देशों में इनके मसाले निर्यात होते हैं। इसीके चलते धर्मपाल देश में 25 करोड़ रुपए वेतन घर लाने वाले अपनी कंपनी के सीईओ बन गए। लेकिन अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा वह आर्य समाज, गुरुकुल और समाज सेवा के विभिन्न कार्यों में दान देते रहते थे। हालांकि अपना जीवन भी वह शान ओ शौकत से जीते थे। अपने उत्पादों का स्वयं ब्रांड अंबेसड़र बन कर भी उन्होंने जबर्दस्त लोकप्रियता पाई। आपकी मेहरबानी से उनके विज्ञापनों की टैग लाइन आज भी मशहूर है। भारत सरकार ने व्यापार-उद्योग में किए गए असाधारण कार्यों के लिए 2019 में उन्हें पदमविभूषण से भी सम्मानित किया।

महाशय धर्मपाल ने अपने व्यापार को शून्य से शुरू करके 2 हज़ार करोड़ रुपए से भी अधिक तक पहुंचाया। बड़ी बात यह है कि इतना बड़ा साम्राज्य उन्होंने अपनी ईमानदारी और साख के बल पर खड़ा किया। उनकी ईमानदारी, मेहनत और दान पुण्य के सैंकड़ों किस्से मशहूर है। मसालों के कारोबार के साथ शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में उतरकर स्कूल और माँ चानन देवी की स्मृति में धर्मपाल ने अस्पताल भी बनवाया। अपने इसी अस्पताल में ही उन्हें 26 नवम्बर को दिल का दौरा पड़ा। कल 3 दिसम्बर को तड़के करीब साढ़े 5 बजे उसी समय प्राण त्यागकर वह अपनी अनंत यात्रा के लिए निकल गए, जिस समय वह हर रोज घर से सुबह की सैर और योग आदि के लिए निकलते थे।       

धर्मपाल गुलाटी ने अपने जीवन में विभिन्न दुख और कष्ट झेलते हुए भी, सफलता और लोकप्रियता का जो इतिहास रचा, उससे वे बरसों बरसों तक कोटि जनों के लिए प्रेरणा स्त्रोत बने रहेंगे।  


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Comments

Sarthak Gulati said…
This is so inspirational. May his soul rest in peace 🙏🙏🙏😇

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