दिलीप कुमार 98 नॉट आउट । सुप्रसिद्द दैनिक 'नवभारत टाइम्स' के संपादकीय पृष्ठ पर 12 दिसम्बर 2020 को सभी संस्करण में प्रकाशित मेरा लेख- धारदार, शानदार दिलीप कुमार
दिलीप कुमार आज भी क्यों हैं खास
- प्रदीप सरदाना
वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्म आलोचक
भारतीय सिनेमा के दिग्गज अभिनेता दिलीप
कुमार 11 दिसम्बर को 98 बरस के हो गए। यह मौका दिलीप कुमार और
उनके परिवार के लिए ही नहीं पूरे फिल्मोद्योग के लिए खास है। दिलीप कुमार भारतीय
फिल्म संसार के अकेले ऐसे नायक हैं जो उम्र के 98 वें वर्ष में पहुँच पाए हैं। उनके
पीछे उनसे सिर्फ 7 महीने छोटे एक और शानदार अभिनेता चंद्रशेखर हैं। यहाँ तक विश्व
सिनेमा में भी दिलीप कुमार से उम्र में बड़े एक ही अभिनेता हैं, अमेरिका के नॉर्मन लॉयड जो अब 106 साल के हो चुके हैं। भारतीय सिनेमा के
लिए निसंदेह यह बड़ी खुशी और संतुष्टि की बात है कि ‘लिविंग
लिजेंड’ दिलीप कुमार आज हम सब के बीच हैं।
हालांकि दिलीप कुमार के जीवन की इस बड़ी उपलब्धि के बाद भी कोरोना व कुछ अन्य कारणों से इस बार उनके जन्म दिन पर, उनके घर में कोई समारोह आयोजित नहीं हुआ। लेकिन उन्हें फोन पर बधाई देने वालों का तांता लगा रहा। दिलीप कुमार को लेकर उनकी पत्नी सायरा बानो से मेरी अक्सर बातचीत होती रहती है। फिल्म संसार में ऐसी अभिनेत्री पत्नियों की मिसाल कम मिलती हैं, जो अपने पति की सेहत और खुशी के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दें। सायरा बानो अपने ‘साहब’ की ज़िंदगी को ही नहीं उनकी यादों और उपलब्धियों को भी खूबसूरती से सँजोये हुए हैं।
यूं भारतीय सिनेमा ने एक से एक अभिनेता दिये हैं। लेकिन दिलीप कुमार एक ऐसा अभिनेता हैं, जो सदी में एक बार होता है। हालांकि आज बहुत लोग अमिताभ बच्चन को सदी का महानायक कहते हैं। लेकिन दिलीप कुमार अभिनय का स्कूल हैं और अमिताभ बच्चन उन्हीं की अभिनय परंपरा को आगे ले आए हैं। कोई शक नहीं पिछले करीब 40 बरसों से अमिताभ बच्चन हिन्दी सिनेमा के शहंशाह बने हुए हैं। अपने 51 बरसों के फिल्म करियर में अमिताभ ने कई सुपर हिट और अविस्मरणीय फिल्में देकर लोकप्रियता के मामले में दिलीप कुमार को पीछे छोड़ दिया है। लेकिन जब भी दोनों के बीच अभिनय का मूल्यांकन होगा, तब अमिताभ उन्नीस और दिलीप कुमार बीस कहे जाएँगे।
दिलीप कुमार को लेकर मेरी राज कपूर, सुनील
दत्त, मनोज कुमार और अमिताभ बच्चन सहित कुछ और भी अभिनय
के महारथियों के साथ बात होती रही। अभी चंद दिन पहले सदाबहार अभिनेता धर्मेन्द्र
से उनके जन्म दिन पर 8 दिसम्बर को मेरी बात हुई तो वह बोले, मैं तो शुरू से दिलीप साहब का बड़ा मुरीद हूँ। मैं खुद को खुशनसीब मानता
हूँ कि उनके और मेरे जन्म दिवस की तारीख एक ही सप्ताह में आती है।‘’अमिताभ बच्चन तो यहाँ तक कहते हैं, ‘’जब कोई
मेरे अभिनय को दिलीप साहब से प्रभावित बताता है तो मेरे लिए उससे अच्छा
कॉम्प्लिमेंट कोई हो ही नहीं सकता। जब भी भारतीय सिनेमा के इतिहास का आकलन होगा तो वह दिलीप कुमार से पहले और दिलीप कुमार के बाद के रूप
में होगा।‘’
ऐसे ही कई कारणों से दिलीप कुमार आज भी सबसे खास हैं। बरसों से फिल्मों से दूर रहने के बावजूद आज भी वह ‘अभिनय सम्राट’ कहलाते हैं। यूं दिलीप कुमार की अंतिम फिल्म ‘किला’ 1998 में आई थी और उनकी अंतिम हिट फिल्म ‘सौदागर’ थी, जो 1991 में प्रदर्शित हुई थी। लेकिन ‘सौदागर’ के करीब 30 साल बाद भी दिलीप कुमार के काम का सुरूर दर्शकों के जहन से आज भी उतरा नहीं है।
पेशावर के फलों के व्यापारी आगा खान के
यहाँ 11 दिसम्बर 1922 को जन्मे युसुफ खान अपने 12 बहन भाइयों में एक हैं। घर का
माहौल ऐसा जहां फिल्मों में काम करना तो दूर फिल्में देखने की भी सख्त मना थी। लेकिन
जब युसुफ 8 साल की उम्र में परिवार के साथ मुंबई शिफ्ट हुए तो कुदरत ने उनके
फिल्मों में आने के रास्ते खुद खोल दिये। अपनी 22 साल की उम्र में नौकरी की तलाश
में भटकते हुए युसुफ,जब बॉम्बे टाकीज़ की स्वामिनी और उस दौर की सबसे बड़ी नायिका
देविका रानी से मिले तो उन्होंने युसुफ को दिलीप कुमार नाम देकर, फिल्म ‘ज्वारभाटा’ का
नायक बना दिया।
दिलीप कुमार ने कभी कहीं से अभिनय नहीं सीखा। लेकिन अशोक कुमार और मोती लाल सरीखे कलाकारों की कुछ नसीहत और एक फिल्म को कई कई बार देखकर दिलीप कुमार जल्द ही अभिनय के सिरमौर बन गए। अपने 54 बरसों के फिल्म करियर में दिलीप कुमार ने 60 हिन्दी और 2 बांग्ला फिल्मों में काम किया। इनमें 4 फिल्मों में वह सिर्फ मेहमान भूमिका में थे। लेकिन चाहे उनकी 1944 से 1976 की ‘ज्वार भाटा’ से ‘बैराग’ फिल्म तक, नायक की पहली पारी रही हो। या फिर 1981 से 1998 तक चरित्र अभिनेता के रूप में ‘क्रान्ति’ से ‘किला’ तक की दूसरी यात्रा। दिलीप कुमार ने अधिकतर फिल्मों में इतना जानदार, शानदार और स्वाभाविक अभिनय किया है कि वह दर्शकों के दिलों में घर कर गए। अपनी गमगीन भूमिकाओं से वह ट्रेजिडी किंग बने तो कॉमेडी में भी उन्होंने खूब धमाल किया।
दिलीप कुमार की दस सर्वश्रेष्ठ फिल्मों को लें तो उनमें ‘देवदास’, ‘नया दौर’, ‘मधुमती’,‘मुगल-ए-आजम’, ‘गंगा जमुना’, ‘राम और श्याम’, ‘गोपी’, ‘सगीना’, 'शक्ति’ और ‘सौदागर’ सर्वोपरि हैं। दिलीप कुमार के यह अपने प्राकृतिक अभिनय और अनुपम अंदाज़ का ही करिश्मा रहा कि पृथ्वीराज कपूर, सोहराब मोदी, अशोक कुमार, राज कपूर, बलराज साहनी, संजीव कुमार, राजकुमार और अमिताभ बच्चन जैसे सशक्त अभिनेताओं के सामने भी उनकी मौजूदगी सभी के सिर चढ़कर बोलती रही।
उनके बेमिसाल अभिनय की बानगी यह भी है कि दिलीप कुमार का नाम हिन्दी सिनेमा में
सर्वाधिक पुरस्कार पाने वाले अभिनेता के रूप में गिनीज़ बुक ऑफ
वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है। दिलीप कुमार ऐसे फिल्म कलाकार हैं, जिन्हें दादा साहब फाल्के, पदमविभूषण, पदमभूषण सहित राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले और सर्वाधिक 10 फिल्मफेयर
पुरस्कार सहित कुछ अन्य पुरस्कार पाकर, वह अभी भी सबसे
बढ़त बनाए हुए हैं। वह 98 पर पहुँचकर भी नॉटआउट हैं।
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