उद्धव ठाकरे भाजपा और मोदी से सीख पाते गठबंधन का धर्म। सुप्रसिद्द साप्ताहिक 'पांचजन्य' के 6 दिसम्बर 2020 अंक में प्रकाशित मेरा लेख
उद्धव ठाकरे भाजपा और मोदी से सीख पाते गठबंधन का धर्म
- प्रदीप सरदाना
बिहार
में एक बार फिर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार बन गयी और नीतीश कुमार फिर
से मुख्यमंत्री भी बन गए। इसी के साथ उन सभी विरोधियों को साँप सूंघ गया जो पहले
तो यह मानकर चल रहे थे कि इस बार राज्य में राजग नहीं महागठबंधन की सरकार बनेगी।
फिर जब चुनाव परिणामों में राजग को बहुमत मिला तो उन विरोधियों को लगा कि इसमें
भाजपा को जदयू से बहुत ज्यादा सीटें मिलीं हैं तो अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नहीं
बन पाएंगे। अब मुख्यमंत्री भाजपा का ही होगा। जिससे बिहार की राजनीति में सरकार
बनने से पहले कोई बड़ा राजनैतिक नाटक होगा। लेकिन ऐसा कुछ दूर दूर तक नहीं हुआ और
बहुत ही शांति और सौहार्द के साथ नीतीश कुमार के नेतृत्व में राजग की सरकार का फिर
से गठन हो गया।
यूं
नीतीश कुमार ने अब बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में सातवीं बार शपथ ली है। लेकिन
इस बार उनके मुख्यमंत्री बनने की यह घटना, राजनीति
इतिहास में हमेशा एक बड़े आदर्श के रूप में याद की जाएगी । साथ ही राजनैतिक दलों को
यह बात, बरसों बरसों तक गठबंधन का धर्म भी सीखाएगी। यदि गठबंधन
के अंदर विभिन्न दल अपनी बातों, सिद्धांतों पर पक्के रहें और विभिन्न परिस्थितियों में
भी परस्पर मजबूती से खड़े रहें तो गठबंधन की सरकारें बहुत अच्छे से चल सकती हैं।
गठबंधन
सरकारों के संदर्भ में मुझे तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा की एक बात अक्सर
याद हो आती है। राष्ट्रपति डॉ शर्मा के कार्यकाल में ही पहली बार केंद्र में अटल
बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व में विभिन्न दलों की गठबंधन सरकार का गठन हुआ था। बात
10 जुलाई 1997 की है जब मैं उनसे मिलने के लिए राष्ट्रपति भवन गया था। उनसे चाय के
दौरान अनऔपचारिक बात चीत हो रही थी। किसी बात पर वह मुझसे हँसते हुए बोले- मेरे 5
साल के कार्यकाल में चार प्रधानमंत्री आए, यह भी
एक रिकॉर्ड है। आप जहां बैठे हैं, इसी जगह तब वाजपेयी साहब बैठे थे, जब वह
पहली बार मेरे पास गठबंधन सरकार बनाने का प्रस्ताव लेकर आए। मुझे तब कुछ लोगों ने
कहा कि गठबंधन की सरकार चल नहीं सकतीं। लेकिन मैंने कहा नहीं, गठबंधन
सरकार भी चल सकती है। इसलिए मैंने वाजपेयी जी के प्रस्ताव को माना और वह पहली बार गठबंधन
सरकार के प्रधानमंत्री बने। हालांकि बाद में उनकी सरकार गिर गयी। लेकिन उसके बाद
अभी तक जो भी सरकारें केंद्र में बनीं वह गठबंधन की ही हैं और चल ही रही हैं। मेरा
मानना है कि गठबंधन सरकार में सभी दल अपनी बातों पर अडिग रहें तो आगे भी गठबंधन
सरकारें अच्छे से चलती रहेंगी।‘’ देखा जाये तो शंकर दयाल जी की वह बात बहुत ही सटीक थी।
महाराष्ट्र
विधानसभा का 2019 का चुनाव एक बार फिर भाजपा और शिवसेना ने गठबंधन के रूप में
मिलकर लड़ा था। उससे पूर्व भी पिछले 5 साल से महाराष्ट्र में भाजपा के देवेंद्र
फडणवीस के नेतृत्व में भाजपा-शिवसेना की सरकार थी। इस चुनाव में गठबंधन के चलते भाजपा
ने कुल 288 सीट में से 164 सीट पर ही चुनाव लड़ा था जिसमें से भाजपा ने 105 सीटों
पर विजय प्राप्त की थी। उधर शिवसेना ने 126 सीट पर चुनाव लड़ा लेकिन उसे मात्र 56
सीटों पर ही विजय मिली। जनता ने भाजपा-शिवसेना गठबंधन को कुल 161 सीट देकर इन्हें
सरकार बनाने के लिए स्पष्ट बहुमत का जनादेश दिया था।
जिस
तरह भाजपा को शिवसेना के मुक़ाबले कहीं ज्यादा सीट मिलीं उससे साफ था कि प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी के विकास और अन्य कई उल्लेखनीय कार्यों के चलते वहाँ मोदी लहर थी।
अन्यथा शिवसेना को ज्यादा सीटों पर विजय मिलती। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी चुनाव
प्रचार सभाओं में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की मौजूदगी में शिवसेना को भी वोट
देने की अपील की थी। इसलिए शिवसेना की 56 सीटों पर भी मोदी-भाजपा के मतदाताओं का
बड़ा योगदान था। लेकिन शिवसेना ने इस कटु सत्य को अनदेखा करते हुए भी अपना
मुख्यमंत्री बनाने का एक ऐसा दांव खेल डाला जिसकी उम्मीद शायद किसी को नहीं थी।
ठाकरे
का कहना था कि भाजपा ने चुनाव पूर्व कहा था कि चुनाव में विजय मिलने पर ढाई वर्ष
शिवसेना का मुख्यमंत्री रहेगा और ढाई वर्ष भाजपा का। इसलिए पहले ढाई साल शिवसेना
का मुख्यमंत्री रहेगा और फिर भाजपा का। भाजपा यदि पहले शिवसेना का मुख्यमंत्री
बनाने के लिए तैयार होती है, तभी सरकार का गठन होगा अन्यथा नहीं। शिवसेना की यह
बेसिर पैर की बात सुनकर सभी को झटका सा लगा। भाजपा सहित राज्य के मतदाता भी हैरान
थे कि ऐसा वायदा भाजपा ने कब और कहाँ किया
था?
असल
में पहले भाजपा आला कमान में नरेंद्र मोदी, अमित
शाह, जेपी नड़ड़ा, नितिन गडकरी सहित महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र
फडणवीस सहित सभी को यही लगा कि सरकार में अपना उपमुख्यमंत्री बनवाने और कुछ अच्छे मंत्रालय
पाने के लिए ठाकरे यह सब खेल खेल रहे हैं। लेकिन जब बातचीत के विभिन्न दौर के बाद
भी ठाकरे अपनी गलत जिद पर अड़े रहे और महाराष्ट्र में सरकार का गठन नहीं हो सका तो
साफ हो गया कि उद्धव ठाकरे के इरादे नेक नहीं हैं।
कुछ
दिन के विभिन्न घटनाक्रमों के बाद ठाकरे ने अपने सत्ता मोह की पराकाष्ठा पर
पहुँचते हुए सोनिया गांधी की कॉंग्रेस पार्टी और शरद पवार की एनसीपी के साथ मिलकर
सरकार बनाकर, जनता से प्राप्त जनादेश को खंड खंड कर दिया। सत्ता के
मोह में उद्धव ठाकरे ने अपने शिवसेना दल की उस पहचान को भी पल भर में धूमिल कर दिया, जो
उन्हें अपने पिता बाल ठाकरे से विरासत में मिली थी। उद्धव के इस कदम से शिवसेना की
हिन्दू समर्थक छवि भी तार-तार हो गयी। इस सबसे संदेश यह मिलता है कि इनके खाने के
दाँत कुछ और तो दिखाने के कुछ और हैं।
हालांकि
इस सबके लिए शिवसेना, भाजपा को ही दोष देती रही कि भाजपा ने उद्धव या आदित्य
ठाकरे को ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री बनवा दिया होता तो उन्हें इस नए विकल्प पर
नहीं जाना पड़ता। लेकिन अब जब भाजपा ने बिहार में खुद 74 सीट पाने के बावजूद 43 सीट
जीतने वाली जदयू के नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने में क्षणिक देर नहीं की तो
यह शत प्रतिशत साफ हो गया है कि
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो चुनाव से पहले कहा था, चुनाव
परिणाम आने के बाद भी वह अपने उस कथन पर कायम रहे। जबकि सभी जानते हैं कि इस बार
बिहार में माहौल नीतीश कुमार के पक्ष में नहीं था। पिछले 15 साल से लगातार इस पद
पर रहने सहित कुछ और कारणों से भी जनता नीतीश और उनके जनता दल से नाराज थी। लेकिन
प्रधानमंत्री मोदी के देश और बिहार के विकास के प्रति एक से एक बेहतर कार्यों को
देखते हुए,वहाँ की जनता मोदी के समर्थन में खड़ी रही।
बिहार
में इस बार यदि भाजपा-राजग की सरकार बन पायी तो सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी के कारण। इसका प्रमाण इससे भी मिलता है कि भाजपा ने बिहार में स्वयं 110 सीट
पर लड़ते हुए भी 74 सीट पर विजय प्राप्त की। जबकि जदयू 115 सीट पर चुनाव लड़ने के
बाद भी सिर्फ 43 सीटों पर सिमट गयी।
भाजपा अपनी 74 सीट में 8 सीट राजग के अपने दो सहयोगी दलों ‘हम’ और ‘वीआईपी’ की भी होने से उसके पास कुल 82 सीट हो जाती हैं। क्योंकि इन दोनों दलों को भाजपा ने अपने खाते से ही 18 सीट दी थीं। एक सीट चिराग पासवान की लोजपा को भी ले लें क्योंकि चिराग सिर्फ नीतीश विरोधी हैं, मोदी को तो वह अपना राम कहते रहे हैं। इससे भाजपा और इनकी कुल 83 सीट हो जाती हैं तो नीतीश की सिर्फ 43 यानि भाजपा से करीब आधी। ऐसे में शिव सेना, कॉंग्रेस, आम आदमी पार्टी या राजद आदि में से कोई भी होता तो अपने वायदे से साफ मुकर कर अपना ही मुख्यमंत्री बनाता। लेकिन नरेंद्र मोदी सहित भाजपा के कुछ अन्य शीर्ष नेताओं ने भी अपनी चुनाव सभाओं में भी साफ कह दिया था कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही बिहार में एनडीए की सरकार बनेगी। इसलिए ऐसा ही हुआ।
उधर शिव सेना और उद्धव ठाकरे भी अच्छे से जानते थे कि मोदी अपने वायदे से पीछे नहीं हटेंगे। लेकिन उनके लिए यह बहुत ही शर्मनाक स्थिति थी कि महाराष्ट्र में उन्होंने 56 सीट पाने के बाद भी 105 सीट पाने वाली भाजपा के सामने मुख्यमंत्री बनने का दावा थोक दिया था। लेकिन भाजपा ने गठबंधन की गरिमा और महिमा बनाए रखने के लिए बिहार में 74 सीट पाने पर भी 43 सीट पाने वाले को मुख्यमंत्री बना दिया। इसलिए अपनी खींच मिटाने के लिए ठाकरे ने बिहार चुनाव परिणाम के बाद पहले तो यह राग आलापा कि यदि नीतीश बिहार में सीएम बनते हैं तो इसका श्रेय शिवसेना को जाएगा। फिर जब नीतीश ने सीएम की शपथ ले ली तो शिवसेना ने अपने मुख पत्र ‘सामना’ के संपादकीय में भाजपा पर कटाक्ष करते हुए लिखा- ‘बीजेपी को बिहार में बलिदान करना पड़ा। तीसरे नंबर पर रही जदयू को सीएम पद देना पड़ा। जबकि महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ ऐसा करने से मना कर दिया था। भाजपा के इस बलिदान को लिखने के लिए स्याही कम पड़ जाएगी।‘
असल
में शिवसेना का यह कथन ‘खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे’ जैसा है।
ठाकरे खुद तो गठबंधन तोड़ने के बाद भी तमाम आदर्शों की बलि देते आ रहे हैं। उनके
लिए सत्ता सुख ही परम धर्म बन गया है, राज धर्म और देश धर्म से अब उनका कोई सरोकार नहीं लगता।
ऐसे में भाजपा देश और राज्य हित के साथ गठबंधन भी निभाए और वचन भी तो इससे शिवसेना
की बेचैनी बढ़ना स्वाभाविक है।
यदि
देखा जाये तो बाला साहब ठाकरे के बाद शिवसेना ने कभी भी भाजपा के साथ सच्चा गठबंधन
नहीं निभाया। बाला साहब और प्रमोद महाजन के संयुक्त प्रयासों से भाजपा-शिवसेना का
गठबंधन पहली बार 1989 में हुआ था। जिसके बाद दोनों ने मिलकर 1990 का
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव लड़ा था। लेकिन यह शुरू से देखा जा रहा है कि शिवसेना
अधिक सीट पर चुनाव लड़ने और भाजपा के कम सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद उस प्रतिशत
में शिवसेना से ज्यादा सीट प्राप्त करती रही है। जैसे 1990 में शिवसेना ने 183 सीट
पर लड़कर 52 सीट जीतीं और भाजपा ने 104 सीट पर लड़कर भी 42 सीट पर विजय हासिल की ।
ऐसे ही 1995 में शिवसेना को 183 में से 73 और भाजपा को 105 में से 65 सीट मिलीं। सन
1995 में ही महाराष्ट्र में पहली बार शिवसेना-भाजपा गठबंधन की सरकार बनी। भाजपा की
शिवसेना से सिर्फ 8 सीट कम थीं क्योंकि वह शिवसेना से 78 कम सीटों पर चुनाव लड़ी
थी। लेकिन भाजपा ने खुशी खुशी 14 मार्च 1995 को शिवसेना के मनोहर जोशी को
मुख्यमंत्री की शपथ दिलाकर, महाराष्ट्र में पहली गैर कॉंग्रेसी सरकार की स्थापना करा
दी।
इसके
बाद 1999 में शिवसेना को 161 सीट में से 69 और भाजपा को 117 सीट में से 56 सीटों
पर सफलता मिली। लेकिन तब फिर से कॉंग्रेस सत्ता में आ गयी। सन 2004 में भी शिवसेना
को 163 में से 62 और भाजपा को 111 में से 54 सीट प्राप्त हुईं। जबकि उसके बाद अगले
विधान सभा चुनावों में 2009 में तो
शिवसेना को और भी सदमा लगा जब शिवसेना को 169 सीटों पर अपने उम्मीद्वार उतारने के
पश्चात भी सिर्फ 44 सीट मिलीं और भाजपा ने 119 सीट में से भी 46 सीट जीतकर शिवसेना
को पीछे कर दिया। उन चुनावों तक बाला साहब जीवित थे। उनके रहते हुए ही भाजपा बड़ा
भाई और शिवसेना छोटा भाई बन गयी थी। लेकिन इस सबके बाद भी शिवसेना ने कोई सबक नहीं
लिया और झूठी हुंकार भरती रही।
नवम्बर
2012 में बाल ठाकरे के मरणोपरांत 2014 में मई में केंद्र में मोदी सरकार आ गयी। इसके
बाद 2014 में महाराष्ट्र में चुनाव हुए तो शिवसेना ने भाजपा से अपने लिए ज्यादा
सीट मांगी तो भाजपा उसके लिए सहमत नहीं हुई। इस पर शिवसेना ने एक झटके में 25 साल
पुराने गठबंधन को खत्म करके अलग चुनाव लड़ने का फैसला किया। लेकिन इससे फिर एक बार
शिवसेना को जोरदार झटका लगा और भाजपा को अकेले चुनाव लड़ने पर पहले से कहीं ज्यादा
सफलता मिली। शिवसेना 282 सीट पर लड़ने के बाद सिर्फ 63 सीट जीत सकी। जबकि भाजपा ने
260 सीट पर लड़कर भी 122 सीट पर विजयश्री अपने नाम लिखा दी। लेकिन चुनाव बाद शिवसेना
फिर भाजपा के साथ आ गयी और दोनों ने मिलकर वहाँ सरकार बनाई। जिसमें भाजपा के देवेंद्र
फडणवीस मुख्यमंत्री बने।
यह
सब बताता है कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भाजपा के सामने हमेशा कमजोर रही है।
महाराष्ट्र के बाहर तो शिवसेना का क्या जनाधार है वह हाल ही में हुए बिहार चुनाव
से भी साफ हो गया। जहां सभी सीटों पर शिवसेना की जमानत जब्त हो गयी। अधिकांश सीटों
पर शिवसेना को नोटा से भी कम वोट मिले। फिर भी शिवसेना भाजपा को तंज़ कसती रहती है।
लेकिन भाजपा ने हमेशा शिवसेना को सम्मान दिया है चाहे शिवसेना हमेशा भाजपा के कंधे
पर सवार होना चाहती है।
सन
2014 के लोकसभा चुनावों में भी भाजपा ने अपने अकेले दम पर बहुमंत पाने पर भी सभी सहयोगी
दलों को अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया। प्रधानमंत्री मोदी ने शिवसेना के कद्दावर
नेता रहे सुरेश प्रभु को अपने मंत्रिमंडल में लेना चाहा तो शिवसेना ने उन्हें अपने
कोटे से मंत्री बनाने से इंकार कर दिया। तब भाजपा ने सुरेश प्रभु को अपने कोटे से
मंत्री बनाया और शिवसेना के कोटे से अलग से अनंत गीते को मंत्री बनाया गया। लेकिन
शिवसेना केंद्र सरकार में रहते हुए भी भाजपा और पीएम मोदी को लेकर ज़्यादातर विरोधियों
जैसे बयान ही देती रही।
सच
कहा जाये तो गठबंधन निभाने और रिश्ते निभाने में भारतीय जनता पार्टी औए
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कोई सानी नहीं। इसके बावजूद शिवसेना के बाद अकाली दल
जैसे राजग के सबसे पुराने घटक अकाली दल ने भी किसान बिल मामले में एक पल में भाजपा
का साथ छोड़ दिया। जबकि नरेंद्र मोदी हमेशा प्रकाश सिंह बादल को बड़ा सम्मान देते आए
हैं। उधर जब 2017 के पंजाब विधानसभा चुनाव के समय जनता, अकाली
दल के प्रति बहुत ज्यादा नाराज थी तो भाजपा तब यदि अकाली दल से अलग होकर अकेले
चुनाव लड़ती तो भाजपा वहाँ सरकार बनाने की स्थिति में आ सकती थी। लेकिन भाजपा ने
अकाली दल का साथ नहीं छोड़ा। इसीके चलते पंजाब की सरकार कॉंग्रेस के पास चली गयी।
इधर
अब बिहार में भी नीतीश कुमार के प्रति जनता का रोष देखने के बाद भी भाजपा ने
जदयू-नीतीश को अपने से अलग नहीं किया। चाहे नीतीश भी कितनी ही बार अपने तेवर
दिखाते रहे। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इतनी
लोकप्रियता-सफलता पाने के बाद भी, हमेशा सहज रहकर सभी को साथ अपने रिश्ते और वचन निभाए
हैं। काश उद्धव ठाकरे भाजपा और नरेंद्र मोदी से गठबंधन का धर्म और रिश्तों का मर्म
सीख पाते !
('पांचजन्य' में प्रकाशित मेरा लेख कुछ नए इनपुट्स के साथ)
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