चार प्रधानमंत्री के कार्यकाल में मुख्य चुनाव आयुक्त रहे शेषन ने जब कर दिया था प्रेस का बहिष्कार

देश के सर्वाधिक चर्चित सीईसी रहे शेषन के साथ मेरी बरसों पुरानी वह दिलचस्प बातचीत 

- प्रदीप सरदाना

  वरिष्ठ पत्रकार 

मुख्य चुनाव आयुक्त का पद क्या होता है, इसकी क्या शक्तियाँ हैं और देश के मुख्य चुनाव आयुक्त का क्या नाम हैं ? ऐसे कई सवालों के जवाब देश के आम जनों को पहली बार तभी पता लगे जब टीएन शेषन दिसंबर 1990 में देश के मुख्य चुनाव आयुक्त बने। शेषन से पहले देश में 9 व्यक्ति मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर आसीन हो चुके थे। लेकिन देश के अधिकतर आम नागरिक इस बात से अनभिज्ञ थे कि यह पद इतना शक्तिशाली होता है। यहाँ तक आम जनता कभी यह जानने का प्रयास भी नहीं करती थी कि देश के मुख्य चुनाव आयुक्त का क्या नाम हैं।

असल में टीएन शेषन ने अपने 12 दिसंबर 1990 से 11 दिसंबर 1996 के 6 बरस के कार्यकाल में चुनाव और चुनाव प्रणाली में इतने सुधार किए कि शेषन लगातार सुर्खियों में बने रहे। मुख्य चुनाव आयुक्त की शक्तियों का पूरी तरह इस्तेमाल भी शेषन ने किया और चुनाव में कहीं भी जरा सी गड़बड़ी या नियम पालन में अवहेलना होने पर चुनाव तक रद्द करने में जरा भी संकोच नहीं किया।

शेषन देश के ऐसे अकेले मुख्य चुनाव आयुक्त रहे हैं जिनके कार्यकाल में चार प्रधानमंत्री, चंद्रशेखर, पी वी नरसिंहाराव, अटल बिहारी वाजपेयी और एचडी देवेगौड़ा आए।


इस दौरान ऐसे कुछ मामले भी आए जब अपने सिद्दांतों के सामने उन्होंने प्रधानमंत्री की भी नहीं सुनी।हालांकि मुख्य चुनाव आयुक्त से पहले वह भारत सरकार में राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते केबिनेट सचिव जैसे शिखर के पद पर भी रहे। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त बनने पर तो शेषन ने चुनावों में पारदर्शिता लाने के मकसद से मतदाता पहचान पत्र से लेकर चुनाव के दौरान उम्मीदवारों के खर्च की सीमा तय करने और चुनाव में सरकारी तंत्र के इस्तेमाल को लेकर कई नए नियम और सुधारों को सख्ती से लागू करवाया।

अपने सिद्दांतों को लेकर वह इतने अडिग थे कि उन्होंने एक समय प्रेस का बहिष्कार तक कर दिया था। शेषन ने प्रेस का बहिष्कार कर दिया है इस खबर को तब सबसे पहले मैंने ही उजागर किया था। शेषन के इस निर्णय का पता मुझे तब लगा जब 15 अप्रैल 1994 शाम को मैंने उन्हें उनके घर फोन किया। फोन खुद शेषन ने ही उठाया। मैंने उनसे कहा कि मैं पुनर्वास अखबार का संपादक प्रदीप सरदाना बोल रहा हूँ और फोन पर ही आपका एक छोटा सा इंटरव्यू करना चाहता हूँ।

मेरे यह कहने पर शेषन बोले-मैंने अब अखबार वालों से बात करना बंद कर दिया है।

मैंने हैरान होते हुए उनसे पूछा – पर ऐसा क्यों किया आपने। क्या कोई खास कारण ? तब शेषन ने मुझसे कहा-“मैंने प्ऐसा क्यों किया, यह मैं भगवान को भी नहीं बताऊंगा।''

मैंने उनसे कहा- आप पहले तो प्रेस से बहुत बात करते थे, क्या अब आपसे कभी बात नहीं हो पाएगी? इस बार शेषन का जवाब था-“ बिलकुल, आप चाहे जितना भी कहें। मैंने प्रेस से बात करना बंद कर दिया सो कर दिया। मेरा फैसला पक्का है, मैं अब प्रेस से सौ प्रतिशत बात नहीं करूंगा। यहाँ तक आप या कोई प्रेस वाला मुझसे टाइम भी पूछेगा कि क्या टाइम हुआ है, तो मैं वह  भी नहीं बताऊंगा।“

इतना होने पर भी मैंने हिम्मत नहीं हारी और उनसे कहा- शेषन साहब प्रेस ने तो आपको हमेशा बहुत सहयोग दिया है। आपके कामकाज की प्रशंसा की है...

मेरी बात पूरी होने से पहले ही शेषन बोले-“जी मैं जानता हूँ, मैं इसके लिए प्रेस का आभारी हूँ। पर अब प्रेस से बात नहीं करूंगा। मेरा प्रेस से भरोसा उठ गया है। मैं आपकी और आपके अखबार की बात नहीं कर रहा हूँ पर पत्रकार एक अलग तरह से काम करते हैं। क्या का क्या लिख देते हैं।“

मैंने उनसे फिर कहा- आप प्रेस से बात नहीं करेंगे तो आपकी बात लोगों तक कैसे पहुंचेगी? आप जो काम कर रहे हैं उसे लोग कैसे जानेंगे?

इस बात पर शेषन कुछ आक्रोशित होकर बोले-“ यदि अपनी बात लोगों तक पहुंचाने का जरिया प्रेस ही है तो मुझे अपनी बात लोगों तक नहीं पहुंचानी है। मुझे प्रेस से नफरत नहीं है। ज़माना था मैंने प्रेस को इंटरव्यू दिये, उनसे बातें कीं। लेकिन अब कोई भी प्रेस वाला कहे लेकिन मैं किसी से बात नहीं करूंगा। आप किसी से पूछ लें।“

मैंने यहाँ फिर पूछा-यह निर्णय आपने कितने दिन पहले लिया? अब शेषन बोले-“यह भी नहीं बताऊंगा। नमस्कार।“ यह कहकर उन्होंने फोन रख दिया।

शेषन के प्रेस से बातचीत न करने के फैसले के बावजूद मैं उन्हें कुरेदते कुरेदते काफी बातें करने में सफल हो गया था। इसलिए मेरे साथ उनकी यह बातचीत ही इतनी दिलचस्प हो गयी थी कि मैंने इतनी ही बातचीत को पुनर्वास की कवर स्टोरी बनाकर प्रस्तुत कर दिया। जब पुनर्वास का अंक प्रकाशित हुआ तो सभी को पता लगा कि शेषन ने प्रेस का बहिष्कार कर दिया है। ज़ाहिर है मीडिया के लिए यह बड़ी खबर थी कि देश के मुख्य चुनाव आयुक्त अब प्रेस से बात नहीं कर रहे। मेरी पुनर्वास में प्रकाशित इस बातचीत का हवाला देते हुए देश की दो बड़ी न्यूज़ एजेंसी पीटीआई और यूएनआई ने तभी इस पर एक खबर जारी कर दी। जिसे अगले दिन देश के कई समाचार पत्रों ने प्रमुखता से कुछ समाचार पत्रों ने तो अपने प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित किया।

मेरी इस स्टोरी के बाद में भी शेषन प्रेस से बातचीत करने से मना करते रहे। कुछ दिन बाद जब शेषन भुवनेश्वर से लौटते हुए, कोलकाता हवाई अड्डे पर तीन घंटे के लिए रुके तो वहाँ कुछ पत्रकारों उनसे बात चीत करने का अनुरोध किया। लेकिन उन्होंने तब भी प्रेस से बात करने से मना कर दिया। लेकिन पत्रकारों के बार बार आग्रह पर शेषन इस शर्त पर प्रेस से मिलने को तैयार हुए कि वे बिना कलम और नोटबुक के आयें और उनसे कोई सवाल नहीं पूछें।

15 दिसम्बर 1932 को केरल के पलक्कड जिले के एक गाँव में जन्मे टी एन शेषन का 10 नवम्बर 2019 को चेन्नई में 87 वर्ष की उम्र में निधन हो गया था। शेषन का काम और व्यक्तित्व ऐसा था कि उनके सेवा निवृत होने के 25 साल बाद भी उनको याद किया जाता है।  

  

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