रूस में आज भी गूँजते हैं राज कपूर, मुकेश और शैलेंद्र के गीत
रूस में आज भी गूँजते हैं राज कपूर, मुकेश और शैलेंद्र के गीत
- प्रदीप सरदाना
वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्म समीक्षक
महान फ़िल्मकार राज कपूर भारतीय सिनेमा के ऐसे पहले अभिनेता रहे जिनकी
लोकप्रियता देश की सरहदों को पार करते हुए दुनिया के कई देशों में पहुंची। जिनमें
रूस तो ऐसा देश रहा जहां राज कपूर घर घर में लोकप्रिय हो गए थे।
राज कपूर को रूस में जिस फिल्म ने सबसे पहले जबरदस्त लोकप्रियता दिलाई, वह फिल्म थी ‘आवारा’। सन 1951 में बनी ‘आवारा’ से राज कपूर तो रूस में लोकप्रिय हुए ही। साथ ही
इस फिल्म में शैलेंद्र के लिखे गीत ‘आवारा
हूँ’ ने भी ऐसी धूम मचाई कि मुकेश के गाये इस गीत का
जादू, वहाँ आज तक बरकरार है। आज बरसों बाद भी, रूस में राज कपूर, मुकेश
और शैलेंद्र के गीत गूंज रहे हैं।
इसकी हालिया मिसाल यह है कि गत 14 दिसम्बर को राज
कपूर के 96 वें जन्म दिन पर मॉस्को में हिंदुस्तानी
समाज रूस और जवाहरलाल नेहरु सांस्कृतिक केंद्र मॉस्को द्वारा "एक शाम राज
कपूर और गीतकार शैलेन्द्र के नाम" का
आयोजन किया गया।
इस अन्तराष्ट्रीय ऑन लाइन साहित्यिक संगीतमयी संध्या में रूस और भारत के अतिरिक्त कुछ अन्य देशों के भी, राजकपूर, मुकेश और शैलेंद्र प्रशंसकों ने हिस्सा लिया।
कार्यक्रम का उद्घाटन
करते हुए रूस में भारत के राजदूत वेंकटेश वर्मा ने कहा -"राजकपूर की फिल्मों
और गीतों ने
हिंदुस्तान और रूस को बहुत प्रभावित किया है। आज 70 साल बाद भी यह जादू मौजूद है। राजकपूर की फिल्मों की बदौलत भी दोनों
देशों की दोस्ती मजबूत हुई है। हिन्दुस्तानी समाज को
में इस खूबसूरत कार्यक्रम को आयोजित करने के लिए अपनी बधाई और शुभकामनाएं देता हूँ।‘’
साथ ही श्री वेंकटेश ने इस अवसर पर कार्यक्रम में
सर्वश्रेष्ठ गीत प्रस्तुत करने वालों को दस हज़ार रूबल के पुरस्कार की घोषणा भी की।
इस यादगार कार्यक्रम में किसने क्या कहा, आईए बताते हैं-
सिनेमा के जाने माने लेखक प्रोफेसर प्रह्लाद अग्रवाल ने कहा
-"राजकपूर दुनिया के ऐसे महान
अभिनेता रहे कि जितना
वह जुबान से बोलते थे , उससे कहीं अधिक आंखों से बोलते थे। राज कपूर हमारे दिल मे हमेशा थे, हमेशा रहेंगे। राजकपूर और शैलेन्द्र ने अपनी
फिल्मों और गीतों से दुनिया को मोहब्बत का पैगाम दिया। जिसके पास मोहब्बत भरा दिल
है वह व्यक्ति ही सबसे बड़ा है।
हिंदुस्तान के प्रख्यात कवि नरेश सक्सेना ने कहा- "शैलेन्द्र
केवल सिनेमा के ही मशहूर गीतकार नहीं थे बल्कि वह हिंदी के बड़े कवि भी थे। उनके
गीतों के शब्द हमारे दिल मे समाये हुए हैं।
शैलेन्द्र आज के समय के कबीर हैं। कबीर और तुलसी जैसी लोकप्रियता केवल शैलेन्द्र
के गीतों को प्राप्त है।
नादान परिंदे, आज दिन चढ़ेया और अगर तुम साथ हो जैसे गीतों के लिए
तीन बार फिल्मफेयर अवार्ड से सम्मानित प्रसिद्द गीतकार डॉ इरशाद कामिल का कहना था "
शैलेन्द्र के सभी गीतों को मैं अपना दोस्त मानता हूँ। उनके गीत एक दोस्त की तरह
मेरे साथ रहते हैं। वह मुझे सहारा देते हैं। शैलेन्द्र की खासियत यह है कि वह सूफी
भी हैं, आशिक भी , देशभक्त
भी और विद्रोही भी।
उधर शैलेंद्र पर दो पुस्तकों ‘धरती कहे पुकार के’ और ‘तू प्यार का सागर है’ का संपादन कर चुके तथा शैलेंद्र सम्मान के संस्थापक डॉ इन्द्रजीत सिंह ने कहा कि "शैलेन्द्र के गीतों को लोग कबीर के दोहों,
तुलसी की चौपाइयों और ग़ालिब के शेरो की तरह गाते हैं। उनके गीत मुहावरे और लोकोक्तियों की तरह हमारी ज़िंदगी का हिस्सा हैं।
मॉस्को स्टेट यूनिवर्सिटी की रूसी हिंदी भाषा की प्रोफेसर गुजेल
स्त्रेलकोवा ने कहा कि राजकपूर की फिल्मों और शैलेन्द्र के
गीतों की दीवानगी बहुत लंबे समय से हम रूसियों के मन मे रही है। फणीश्वर नाथ रेणु की
कहानी 'मारे गए
गुलफ़ाम' (जिस पर शैलेंद्र ने राज कपूर को नायक लेकर फिल्म 'तीसरी कसम' बनाई थी) का रूसी
भाषा मे अनुवाद किया गया। फिल्म ‘तीसरी
कसम’ रूस में प्रदर्शित भी हुई थी।
इस कार्यक्रम की एक अच्छी बात यह रही कि इसमें शैलेंद्र के दो बेटों और
बेटी ने भी इसमें हिस्सा लिया। शैलेन्द्र के बेटे मनोज शैलेन्द्र ने कहा कि उनके
पिता रूस के प्रसिद्ध कवि पुश्किन को बहुत पसंद करते थे। दिलचस्प
यह है कि राजकपूर साहब शैलेन्द्र जी को पुश्किन नाम से
संबोधित करते थे। शैलेन्द्र की बेटी अमला शैलेन्द्र मजूमदार ने कहा कि बचपन में जब
हम उनका लिखा गीत ‘दिल का हाल सुने दिल वाला’ के अन्तरे सुनते थे तो बड़ी हसीं आती थी लेकिन जब
बड़े हुए तो पता चला कि उस व्यंग्य गीत में
कितना गहरा अर्थ है। यह गीत समाज में फैले भ्रष्टाचार की कलई खोलता है।
शैलेंद्र के छोटे बेटे फ़िल्म निर्देशक दिनेश शैलेन्द्र ने भी इस अवसर पर अपनी बात रखते हुए कहा-"राजकपूर साहब और शैलेन्द्र जी के बारे
में इतनी अच्छी शाम आयोजित की गई, इसके लिए मैं
हिंन्दुस्तानी समाज और जवाहरलाल नेहरू सांस्कृतिक केंद्र मॉस्को का आभार व्यक्त
करता हूँ "
संगीत कार्यक्रम की शुरुआत शैलेन्द्र
के लोकप्रिय गीत "तू प्यार का सागर है" से हुई, जिसे गायक एलेग्जेंडर गाकर शुरू में ही खूबसूरत
माहौल बना दिया। बाद में पीयूष निगम, मेहुल , आमिर खान
संतोष मिश्रा मारिया ,जितेश, अर्णव, फियाना और सनाया ने भी शैलेन्द्र के गीतों को गाकर कार्यक्रम को रंगमय कर दिया।
कार्यक्रम में जो अन्य गीत प्रस्तुत किए गए उनमें प्रमुख हैं -किसी की
मुस्कुराहटों पे हो निसार, सब कुछ सीखा हमने, रमैया
वस्ता वैया , सजन रे झूठ मत बोलो, दोस्त दोस्त न रहा, मेरा जूता
है जापानी। कार्यक्रम का खूबसूरत संचालन लेखिका प्रगति टिपनिस ने किया। हिंदुस्तानी
समाज के अध्यक्ष डॉ
कश्मीर सिंह ने कार्यक्रम में भाग लेने वाले सभी
अतिथियों का स्वागत किया तो वरिष्ठ
उपाध्यक्ष आनंद शेखर सिंह ने सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त।
राज कपूर जैसे महान कलाकार की आज बरसों बाद भी रूस में ऐसी लोकप्रियता
देख निश्चय ही प्रसन्नता होती है। जो व्यक्ति या संस्थाएं राज कपूर, शैलेंद्र और मुकेश की स्मृति में ऐसे कार्यक्रम आयोजित
कराती हैं, उनकी जितनी प्रशंसा की जाये कम है।
मुझे राज कपूर अपनी बहुत सी शानदार फिल्मों और अपने बेमिसाल अभिनय के कारण
तो पसंद हैं ही। लेकिन इसलिए और भी प्रिय हैं कि राज कपूर ने अपनी असली ज़िंदगी में
अपना अंतिम संवाद मेरे साथ ही किया था। असल में जब 2 मई 1988 को दिल्ली के सिरीफ़ोर्ट
सभागार में दादा साहब फाल्के सम्मान लेने आए राज कपूर को अस्थमा का जबरदस्त दौरा पड़ा
था, तब मैं वहीं था। मैं ही उनको राष्ट्रपति भवन की एंबुलेंस
में सिरी फोर्ट से आल इंडिया मेडिकल हॉस्पिटल (एम्स) लेकर गया।
एंबुलेंस में हमारे साथ कृष्णराज कपूर भी थीं। मैंने ही राज कपूर को एम्स
में दाखिल कराया। यहाँ तक देर रात तक मैं और कृष्णा जी आईसीयू में भी उनके साथ रहे।
आईसीयू में ही मेरे साथ वार्तालाप करते हुए राज
कपूर अचेतावस्था में चले गए। मेरा उनके साथ शायद पूर्व जन्म का कोई रिश्ता रहा होगा
जो इतने बड़े फ़िल्मकार के अंतिम समय में मुझे उनकी सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
हालांकि 2 मई 1988 की उस शाम से देर रात तक के घटनाक्रम की कहानी बेहद
मार्मिक और लंबी है। जिसके कुछ हिस्से मैं
पिछले 32 बरसों में ‘धर्मयुग’, ‘नवभारत टाइम्स’, ‘दैनिक ट्रिब्यून’, विविध भारती, दूरदर्शन, एफएम गोल्ड और एबीपी
न्यूज़ के साथ बीबीसी पर भी अपने विभिन्न स्तम्भ, लेखों और
अपने इंटरव्यू में भी प्रस्तुत कर चुका हूँ।
राज कपूर की बड़ी बेटी रितु नन्दा ने अपने पिता पर लिखी पुस्तक –‘राज कपूर स्पीक्स’ जब मुझे अक्तूबर 2003 में भेंट की तो, उन्होंने पुस्तक के पहले पेज पर ही मुझे एक नोट लिखते हुए, इस बात के लिए अपना धन्यवाद-आभार प्रकट किया था। कि मैं राज कपूर के अंतिम समय में उनके साथ था। रितु नन्दा का मेरे नाम लिखा वह हस्त लिखित नोट यहाँ आपके साथ साझा कर रहा हूँ। शायद राज कपूर के प्रशंसकों को उनकी बेटी के ये शब्द और विचार अच्छे लगें।
हालांकि तब मुझे बहुत उम्मीद थी कि राज कपूर ठीक हो जाएँगे। लेकिन पूरे एक महीना ‘कोमा’ में रहने के बाद 2 जून 1988 को राज कपूर ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। लेकिन अपनी फिल्मों अपने गीतों के माध्यम से वह आज भी अमर हैं और कल भी रहेंगे।
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Comments
गायक मुकेश, गीतकार शैलेन्द्र और संगीतकार शंकर-जयकिशन की त्रिवेणी ने वैश्विक स्तर पर अनगिनत कालजयी गीतों का सृजन किया है. हिन्दी सिने गीत-संगीत ने पहली बार भारत की सीमा लाँघ कर दक्षिण-पूर्व एशिया, सोवियत रूस सहित विश्व के अन्य ढेरों देशों में ‘आवारा हूँ’ गीत के माध्यम से मुकेश, शैलेन्द्र और शंकर-जयकिशन ने मिल कर सुर-स्वर-लय की जो अलख जगायी थी वो आज भी सर्वत्र गुंजायमान है. राज कपूर के अधरों पर जब-जब इस त्रिवेणी से उपजी सुर धारा प्रवाहित हुयी है, तब-तब इनके सुरीले गीतों का सौन्दर्य अपना आत्मिक शृंगार लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मुखर हुआ है.
बधाई एवं मँगल कामनाएँ ��
डॉ. राजीव श्रीवास्तव
गायक मुकेश, गीतकार शैलेन्द्र और संगीतकार शंकर-जयकिशन की त्रिवेणी ने वैश्विक स्तर पर अनगिनत कालजयी गीतों का सृजन किया है. हिन्दी सिने गीत-संगीत ने पहली बार भारत की सीमा लाँघ कर दक्षिण-पूर्व एशिया, सोवियत रूस सहित विश्व के अन्य ढेरों देशों में ‘आवारा हूँ’ गीत के माध्यम से मुकेश, शैलेन्द्र और शंकर-जयकिशन ने मिल कर सुर-स्वर-लय की जो अलख जगायी थी वो आज भी सर्वत्र गुंजायमान है. राज कपूर के अधरों पर जब-जब इस त्रिवेणी से उपजी सुर धारा प्रवाहित हुयी है, तब-तब इनके सुरीले गीतों का सौन्दर्य अपना आत्मिक शृंगार लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मुखर हुआ है.
बधाई एवं मँगल कामनाएँ ��
डॉ. राजीव श्रीवास्तव
गायक मुकेश, गीतकार शैलेन्द्र और संगीतकार शंकर-जयकिशन की त्रिवेणी ने वैश्विक स्तर पर अनगिनत कालजयी गीतों का सृजन किया है. हिन्दी सिने गीत-संगीत ने पहली बार भारत की सीमा लाँघ कर दक्षिण-पूर्व एशिया, सोवियत रूस सहित विश्व के अन्य ढेरों देशों में ‘आवारा हूँ’ गीत के माध्यम से मुकेश, शैलेन्द्र और शंकर-जयकिशन ने मिल कर सुर-स्वर-लय की जो अलख जगायी थी वो आज भी सर्वत्र गुंजायमान है. राज कपूर के अधरों पर जब-जब इस त्रिवेणी से उपजी सुर धारा प्रवाहित हुयी है, तब-तब इनके सुरीले गीतों का सौन्दर्य अपना आत्मिक शृंगार लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मुखर हुआ है.
बधाई एवं मँगल कामनाएँ 🌹
डॉ. राजीव श्रीवास्तव