जब छत की ओर देखते हुए बहुत कुछ बता गए अरुण जेटली
नहीं भूलती 35 साल पहले की छात्र नेता अरुण जेटली से पहली मुलाक़ात
- प्रदीप सरदाना
वरिष्ठ पत्रकार
बात 24 अगस्त 1985 की है, जब मैं अरुण जेटली का इंटरव्यू करने
के लिए उनसे मिला था। तब वह सक्रिय राजनीति में नहीं थे, हाई कोर्ट में तेजी से उभरते वकील
थे। उन दिनों मैं ‘नवभारत टाइम्स’ के लिए छात्र संघ पर एक कवर स्टोरी
कर रहा था।
उनसे दिल्ली हाईकोर्ट के उनके चैंबर में कुछ देर बात करने के
बाद ही मुझे एहसास हो गया कि वह एक बेहद काबिल इंसान हैं। लेकिन यह नहीं पता था कि
यही अरुण जेटली एक दिन राजनीति के लगभग शिखर तक पहुंचेंगे या उस दिन से ठीक 34 बरस
बाद उसी तारीख को वह इस दुनिया को अलविदा कह देंगे, जिस तारीख को मैंने उनसे यह
इंटरव्यू किया था।
अरुण जेटली के निधन के बाद जब उनसे अपनी पहली मुलाक़ात की
तारीख जानने के लिए मैंने अपना पुराना रिकॉर्ड तलाशा तो यह बात मुझ बेहद हैरान
करने वाली रही कि मैं उनसे 24 अगस्त को ही मिला था। अब गत 24 अगस्त को उन्हें
दुनिया से अलविदा कहे एक साल हो गया । लेकिन उनके जाने का गम अब भी दर्द बनकर
उभरता है।
आज 28 दिसंबर को, जब अरुण जेटली के जन्म दिन पर उनकी स्मृति में, नयी दिल्ली के फिरोज़शाह कोटला मैदान
स्थित अरुण जेटली स्टेडियम में, अरुण जेटली की प्रतिमा की स्थापना हुई है, तो उनकी पुरानी यादें फिर उभर आई हैं।
अरुण जेटली ने दिन रात मेहनत करके राजनीति में तो असाधारण कार्य
किए ही। देश में जीएसटी प्रणाली भी उन्हीं के वित्त मंत्री रहते हुए लागू हुई। जिसके
लिए जेटली ने दिन रात बहुत मेहनत की। साथ ही क्रिकेट और इस स्टेडियम के लिए भी अरुण
जेटली ने अपना उल्लेखनीय योगदान दिया है। तभी गत वर्ष ही इस स्टेडियम का नाम अरुण जेटली
के नाम पर रख दिया था। आज गृह मंत्री अमित शाह ने उनकी प्रतिमा का अनावरण करते हुए
कहा- ‘’अरुण जेटली मेरे बड़े भाई के समान थे।
उन्होंने मेरी काफी मदद की।‘’
छात्र संघ
से ही की थी राजनीति की शुरुआत
उधर मुझे भी अच्छे से याद है कि बरसों पहले छात्र संघ पर कवर
स्टोरी करने पर अरुण जेटली ने मेरी भी काफी मदद की थी। अरुण जेटली से मैं तब छात्र
संघ और राजनीति को लेकर बात करने गया था। क्योंकि अरुण जेटली सन 1974-1975 में
दिल्ली विश्वविध्यालय के अध्यक्ष रह चुके थे। सिर्फ इतना ही नहीं दिल्ली
विश्वविध्यालय में छात्र संघ चुनाव में सीधे सभी छात्रों द्वारा मतदान करने की प्रक्रिया
में भी उनके प्रयासों की अहम भूमिका थी।
बहुत कम लोग जानते हैं कि इससे एक बरस पहले सन 1973 में जब
दिल्ली छात्र संघ के पहली बार प्रत्यक्ष चुनाव हुए तो उसमें भी अरुण जेटली
उपाध्यक्ष बने थे।
असल में मैं जो स्टोरी कर रहा था उसका मकसद यह था कि छात्र
संघ और उसके चुनावों की क्या भूमिका है और इनका प्रारूप कैसा हो साथ ही यह भी कि
छात्र संघ से निकले लोगों में कितने छात्र नेता राजनीति में आ चुके हैं। मुझे देश
के अन्य प्रमुख विश्वविध्यालयों के छात्र संघ की तो काफी जानकारी मिल गयी थी।
लेकिन दिल्ली के छात्र नेता अब कहाँ कहाँ है इसकी जानकारी ज्यादा नहीं मिल पा रही
थी।
मैंने अरुण जेटली से इंटरव्यू करते हुए बीच में ऐसे ही पूछ
लिया कि क्या आपको डूसू के किसी पूर्व अध्यक्ष या महासचिव के बारे में यह जानकारी
होगी कि अब वे कहाँ हैं और क्या कर रहे हैं। यूं मुझे लगा था कि वह व्यस्त वकील
हैं या तो कहेंगे मुझे नहीं पता या किसी एक दो लोगों के बारे में बता देंगे। लेकिन
मैं तब अवाक रह गया जब जेटली ने दो तीन मिनट में ही अपने चैंबर में छत की ओर देखते
हुए 1974 से 1983 तक के सभी पूर्व अध्यक्ष और महासचिव के बारे में बता दिया कि वे
अब कहाँ हैं। इससे मुझे अपनी स्टोरी करने में काफी मदद मिली।
हालांकि जब वह लगातार छत की ओर देखते हुए मुझे यह समस्त
जानकारी दे चुके तो मैंने हैरानी और मज़ाकिया लहजे में कहा आप तो यह सब छत की ओर
देखकर ऐसे बता रहे हैं जैसे सब छत पर लिखा हो। मेरी इस बात पर वह मुस्करा कर रह
गए। लेकिन तब मैं कुछ ही पलों में उनकी स्मरण शक्ति के साथ उनकी योग्यता को भी समझ
गया। उनकी इन बातों से साफ था कि वह जिन राहों से गुजरते हैं, उन पर आगे भी पैनी नज़र रखे हैं।
उस मुलाक़ात के बाद अरुण जेटली से कई मुलाकातें होती रहीं।
मैंने देखा कि अपनी व्यक्तिगत बातचीत के दौरान कोई बात याद करने के लिए वह अक्सर
छत की ओर निहारते थे। उनका यह खास अंदाज़ देखते हुए मुझे हमेशा उनसे अपनी पहली
मुलाक़ात याद हो आती थी।
जब 1985 की अपनी पहली मुलाक़ात में, मैं उनका इंटरव्यू करने गया था तो
उनके इंटरव्यू से पहले दिल्ली छात्र संघ के
कुछ और पूर्व पदाधिकारियों से बातचीत कर चुका था लेकिन उनमें से किसी के पास समस्त
जानकारी तो क्या दो तीन लोगों की जानकारी मुश्किल से थी। जबकि जिन दिल्ली के छात्र
नेताओं से मैंने बात की उनमें से दो तीन तो सक्रिय राजनीति में थे और पार्षद आदि
भी बन चुके थे। लेकिन अरुण जेटली के पास तब तक कोई बड़ी राजनैतिक ज़िम्मेदारी भी
नहीं थी और छात्र संघ के चुनाव के बाद तब तक उन्हौने कोई अन्य चुनाव नहीं लड़ा था।
छात्र नेता
होने के कारण जेल जाना पड़ा था
दिल्ली में छात्र संघ का चुनाव जेटली ने अखिल भारतीय
विद्यार्थी परिषद के बैनर से लड़ा था और इसी के बाद देश में आपात स्थिति लागू हो
गयी थी जिससे अरुण जेटली को छात्र नेता के कारण जेल जाना पड़ा। इसका एक कारण यह भी
था कि अरुण जेटली तब जय प्रकाश नारायण के भ्रष्टाचार को लेकर शुरू हुए छात्र
आंदोलन में भी सक्रिय हो गए थे। वह तब जय प्रकाश नारायण से अच्छे खासे प्रभावित
थे।
सन 1985 में अरुण जेटली को डूसू अध्यक्ष से अलग हुए 10 साल
हो गए थे। मैंने तब उनसे पहला सवाल यही पूछा कि अपने समय के छात्र संघ चुनाव और आज
के छात्र संघ चुनाव में आप क्या कुछ फर्क महसूस करते हैं ?
इस पर जेटली का जवाब था- “दस साल पहले के और आज के चुनाव
में मुझे थोड़ा सा फर्क तो लगता है। उस समय जय प्रकाश आंदोलन चल रहा था। बड़ी बड़ी
समस्याएँ थीं जिनसे छात्र खुद को अलग नहीं रख पा रहा था। लेकिन अब वह बात नहीं है
अब विद्यार्थी और छात्र संघ अपने कॉलेज और अपने विश्वविध्यालय की स्थानीय समस्याओं
तक ही सिमट कर रह गए हैं। हालांकि मैं चाहता हूँ कि छात्र संघों को स्थानीय
समस्याओं के साथ राजकीय और राष्ट्रीय मुद्दों पर भी यथा संभव गौर करना चाहिए।“
छात्र संघों और इसके चुनावों में जिस तरह राजनीति हावी होती
जा रही है, उसको लेकर आप क्या कहेंगे ?
मेरे यह पूछने पर वह बोले- “मेरा यह मानना है कि छात्र संघ
का चुनाव है तो चुनाव होने का अर्थ राजनैतिक गतिविधि है। आप चुनाव लड़ रहे हैं तो
आप गैर राजनीतिक हो ही नहीं हो सकते।‘’
छात्र
संघ चुनाव में पैसा बहाना गलत
लेकिन छात्र संघ चुनाव में जिस तरह पैसा खर्च किया जाता है।
दिल्ली की एक लोकसभा सीट के लिए उस उम्मीदवार को अपने 5 साल के कार्यकाल वाले
चुनाव के लिए सिर्फ अपने संसदीय क्षेत्र में ही प्रचार करना होता है। लेकिन दिल्ली
विश्वविध्यालय के छात्र संघ का उम्मीदवार अपने एक वर्ष के कार्यकाल के लिए पूरी
दिल्ली यानि सातों संसदीय सीटों के क्षेत्र को अपने पोस्टरों से रंग देता है ?
इस पर अरुण जेटली कहते हैं- “छात्र संघ चुनाव में जिस प्रकार धन का प्रयोग हो रहा है वह तो बदलना चाहिए। एक छात्र संघ चुनाव में पानी की तरह पैसा बहाना कहीं से भी न्याय संगत नहीं है। लेकिन इस चुनाव पद्द्ति को आप नहीं बदल सकते। पोस्टर पर भी प्रतिबंध लगाने वाली बात संभव नहीं हो सकती।"
पिछले कुछ समय से यह भी देखा जा रहा है कि ग्रेजुएट पोस्ट
ग्रेजुएट होने के बाद भी कुछ लोग फिर से ग्रेजुएशन कोर्स में सिर्फ इसलिए दाखिला
लेते हैं कि छात्र संघ का चुनाव लड़ सकें। क्या यह सब गलत नहीं है ?
“बिलकुल गलत है। बीए एमए पास करने के बाद जो लोग दोबारा बीए
में इसलिए प्रवेश लेते हैं कि छात्र संघ का चुनाव लड़ना है तो यह बहुत घटिया बात
है। मैं तो चाहूँगा इस पर रोक लगनी चाहिए।“
इसके बाद मेरा उनसे सवाल था -इस समय कई बार लगता है कि
छात्र संघ अपने उदेश्य से भटक रहे हैं ? इस पर उनका जवाब था-
“मैं यहाँ यह कहूँगा कि छात्र संघों को इस समय सही मार्ग
निर्देशन नहीं मिल रहा। छात्र संघ अधिक से अधिक सफल हों तो यह तभी संभव है जब
विद्यार्थी छात्र संघों और राजनीति दोनों में बराबर दिलचस्पी लें।“
आधा सवाल सुन समझ जाते थे पूरा सवाल
अरुण जेटली से अपनी इस बातचीत के दौरान मैंने यह नोटिस किया
कि मेरे आधे सवाल के बाद ही वह यह समझ जाते थे कि सवाल क्या है, मैं क्या पूछना चाहता हूँ। उनकी
यह आदत, यह समझ अंत तक बनी रही। देश के
वित्त, रक्षा, वाणिज्य, उद्योग और सूचना प्रसारण जैसे बड़े
मंत्रालयों के मंत्री रहते हुए अपने विभिन्न पत्रकार सम्मेलनों या व्यक्तिगत
बातचीत में भी उनकी यह बानगी कई बार देखने को मिलती थी।
जब वह सूचना प्रसारण मंत्री थे तो एक बार मैंने उनसे उनके
इस सन 1985 वाले इंटरव्यू का जिक्र करते हुए कहा था कि तब आपने मुझे बहुत सी
जानकारी कुछ पलों में ही अपने चैंबर की छत पर देखते हुए कैसे दे दी थी, उस इंटरव्यू को मैं कभी नहीं भूल
पाता हूँ। इस पर अरुण जेटली ने अपनी चिरपरिचित मुस्कान बिखेर दी थी। लेकिन अब वह मुस्कान
कभी देखने को नहीं मिलती तो दुख होता है कि इतने योग्य, परिश्रमी और अपने काम के प्रति
विशिष्ट निष्ठा रखने वाले राजनेता को हमने असमय खो दिया। लेकिन एक प्रखर वक्ता, योग्य अधिवक्ता और बेमिसाल नेता
अरुण जेटली की स्मृतियाँ भुलाए नहीं भूलतीं ।
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स्मृतियों के झरोखों से अपनी प्रथम भेंट की तिथि से उनके महाप्रयाण का यूँ मेल खाना एक ऐसा संयोग है जो मन में आज भी किसी काँटे के समान चुभता होगा. पत्रकार होते हुए मानवीय सम्बन्धों को भी साथ-साथ सहेज कर रखना और उसे अपने जीवन में व्यवहारिक रूप देना, एक सम्वेदनशील व्यक्ति होने का प्रमाण है.
आज अरुण जयन्ती के अवसर पर आपका यह आलेख आपके भी सहृदयी होने का एक प्रमाण है.
प्रदीप भाई, आपके इस सामाजिक सरोकार हेतु बधाई एवं मँगल कामनाएँ ��
डॉ. राजीव श्रीवास्तव