देश में दस एफटीआईआई होने चाहिए
भारतीय फिल्म और टेलीविज़न संस्थान (एफटीआईआई) अपने स्थापना के 60 बरस पूरे करके इन दिनों अपनी हीरक जयंती मना रहा है। पुणे स्थित यह देश का सबसे पुराना प्रतिष्ठित संस्थान एशिया का प्रमुख फिल्म प्रशिक्षण केंद्र भी माना जाता है। कभी अभिनय को ‘प्रभु का जन्मजात उपहार’ माना जाता था। लेकिन एफटीआईआई की स्थापना के बाद सभी को यह महसूस होने लगा कि फिल्म तकनीक ही नहीं, फिल्म अभिनय और लेखन आदि का प्रशिक्षण भी अहम है। यही कारण है कि सन 1970 के दशक में पुणे फिल्म संस्थान से प्रशिक्षित छात्रों को फिल्मों में लेने की होड सी मच गयी थी। अब कैसा है यह संस्थान इतने बरसों में यहाँ क्या बदलाव आए और हीरक जयंती पर यहाँ क्या क्या हो रहा है, जैसी बहुत सी बातों को जानने के लिए, हाल ही में एफटीआईआई के निदेशक भूपेन्द्र कैंथोला से वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सरदाना ने विशेष बातचीत की-
भारतीय फिल्म
और टेलीविज़न संस्थान को अब 60 बरस का लंबा समय हो गया है। जहां कुछ लोगों के लिए यहाँ
दाखिला पाना एक बड़ा स्वप्न है, वहाँ देश का एक बड़ा
वर्ग इस संस्थान को लेकर अभी तक अनभिज्ञ है ?
हमारे यहाँ एफटीआईआई की तरफ
वही लोग आकर्षित होते हैं, जो सिनेमा को मनोरंजन से आगे देखते
हैं। सिनेमा एक विधा है। जैसे कोई मेडिकल, इंजीनियरिंग या कानून
की पढ़ाई करता है वैसे ही सिनेमा की पढ़ाई है। पहले चाहे इस संस्थान को कम लोग जानते
थे लेकिन अब इसकी पहचान बढ़ी है। कुछ बरस पहले तक हमारे यहाँ प्रवेश परीक्षा के लिए
ही चार हज़ार आवेदन आते थे लेकिन अब लगभग दो गुना हो गए हैं। इधर हमने सिनेमा विधा और
संस्थान के पाठ्यक्रमों को लेकर उन क्षेत्रों में अपने विशेष जागरूकता अभियान चलाने
भी शुरू किए हैं, जिन राज्यों से बहुत कम लोग आवेदन करते हैं।
लेकिन देश में सिर्फ एक एफटीआईआई है। उसमें यहाँ के कुल 11 पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए सिर्फ कुल 110 सीट हैं। जबकि देश में प्रबंधन और तकनीकी शिक्षा के लिए विभिन्न राज्यों में कई आईआईटी और आईआईएम हैं। क्या देश के कुछ अन्य शहरों में भी कुछ और एफटीआई नहीं होने चाहिएं, या पुणे में भी इसकी सीट बढ़ जाएँ तो इससे प्रतिवर्ष फिल्म विधा के भी बहुत से छात्र निकल सकते हैं !
सीट बढ़ाना या नए एफटीआईआई खोलने का निर्णय तो सरकार ही कर सकती है। यूं कोलकाता में सत्यजित रे के नाम से भारत सरकार के एक और फिल्म संस्थान में भी काफी कुछ एफटीआईआई जैसा ही है और वहाँ भी करीब इतनी ही सीटें हैं। पर मेरी निजी राय है कि देश भर में दस एफटीआईआई होने चाहिएं। फिर इसके कुछ क्षेत्रीय केंद्र, क्षेत्रीय परिसर होने चाहिएं। एफटीआईआई से ज्यादा लोग प्रशिक्षण ले सकें इसके लिए हमने पिछले तीन बरसों में ही देश के 45 शहरों में 20 विभिन्न विधाओं में लघु अवधि के पाठ्यक्रम भी आयोजित किए। जो काफी लोकप्रिय हो रहे हैं।
सिनेमा तकनीक आज जिस तेजी से बढ़ रही है उसे देखते हुए क्या एफटीआईआई में पढ़ाई के लिए आधुनिक साधन भी उसी गति से विकसित हो पाते हैं ? या फिर सरकारी संस्थान होने और बजट की समस्या के चलते पुराने संसाधनों से ही काम चलाने को मजबूर होना पड़ता है?
हमारा संस्थान पूरी तरह से केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित है। अच्छी बात यह है कि यहाँ पैसे की समस्या कभी आड़े नहीं आई । हमारे यहाँ प्रशिक्षण के लिए आधुनिक कैमरों से लेकर नयी तकनीक के सभी संसाधन उपलब्ध हैं। संपादन के लिए नयी से नयी मशीनें यहाँ हैं। साउंड में तो एफटीआईआई का स्टुडियो पूरी दुनिया में किसी भी फिल्म संस्थान का सबसे बड़ा स्टुडियो है। तकनीक, स्थान और सुविधाएं हमारे पास भारत में सबसे ज्यादा है। साठ साल की विरासत है हमारी। जिन्हें बेहतर फिल्म शिक्षा लेनी होती है,वो हमारे संस्थान में ही आते हैं।
तो एफटीआईआई में एरि एलेक्सा जैसे कैमरे भी हैं क्या ? और संस्थान का वार्षिक बजट कितना रहता है ? और एक छात्र की यहाँ वार्षिक फीस क्या है?
जी बिलकुल एरि एलेक्सा कैमरे
भी यहाँ हैं। संस्थान का वार्षिक बजट 50 करोड़ रुपए है। जिसमें स्टाफ के वेतन भी इसी
बजट का हिस्सा है। साथ ही इसी से छात्रों को फीस में सबसिडी मिलती है। तभी एफटीआई में
फीस देश में सबसे कम है। मोटे तौर पर हर छात्र की फीस में औसतन प्रति वर्ष करीब करीब
24 लाख रुपए सालाना सबसिडी मिलती है।
मैं एफटीआईआई को बरसों से देख रहा हूँ। जमाना था जब यहाँ से अभिनय क्षेत्र में ही जया भादुड़ी, डैनी, शत्रुघन सिन्हा, स्मिता पाटिल, शबाना, नसीर, ओम पुरी, अनिल धवन, रेहाना सुल्तान, नवीन निश्चल, मिठुन चक्रवर्ती, रंजीता, विजय अरोड़ा, रजा मुराद सहित सुभाष घई, अड़ूर गोपालकृष्णन, मणी कौल, संजय लीला भंसाली, विधु विनोद चोपड़ा और राज कुमार हिरानी जैसे यहाँ के पूर्व छात्र फिल्म के अन्य क्षेत्रों में भी लोकप्रिय होते रहे।लेकिन अब राजकुमार राव जैसे एक दो नाम ही सामने आते हैं !
असल में 60-70 के दशक में फिल्म प्रशिक्षण के लिए सिर्फ एक एफटीआईआई ही हुआ करता था। इसलिए तब कोई फिल्म बनती थी तो यहाँ के अभिनेता सीधे फिल्मों में ले लिए जाते थे। लेकिन अब देश में कई निजी फिल्म प्रशिक्षण केंद्र हो गए हैं। फिर यह भी कि 1978 में एफटीआई ने अभिनय पाठ्यक्रम बंद कर दिया था। जो कई बरस बाद 2004 में फिर शुरू हुआ। इसलिए बाद के बरसों में अभिनय क्षेत्र में ज्यादा नाम नहीं आए। लेकिन हाल ही के कुछ बरसों के कई पूर्व छात्र भारतीय सिनेमा, टीवी के साथ अंतरराष्ट्रीय सिनेमा के विभिन्न क्षेत्रों में भी खूब नाम कमा रहे हैं।
हीरक जयंती
को लेकर आपके क्या क्या विशेष कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं?
सबसे पहले हमने ‘प्रभात से एफटीआईआई’ का सफर’ पर एक प्रदर्शनी लगाई थी। हालांकि लॉकडाउन के कारण उसे लंबा नहीं चला सके। अब परिसर में जल्द ही संस्थान के अध्यक्ष शेखर कपूर एक 18 फीट ऊंची हीरक जयंती कलाकृति ‘नभ अभीप्सा’ का अनावरण करने जा रहे हैं। जो संस्थान के पुराने कबाड़ से निर्मित हुई है। अभी हमने मनोहर श्याम जोशी प्रीव्यू थिएटर भी बनाया है। अपनी लाइब्रेरी का आधुनुकीकरण करके उसका नामकरण,संस्थान के प्रथम निदेशक और बेहतरीन अभिनेता गजानन जागीरदार के नाम से किया है। हमारे यहाँ जो गर्ल्स हॉस्टल था वह जया बच्चन के समय का था। तब यहाँ पाँच-सात लड़कियां ही दाखिला लेती थीं। जबकि अब 25 लड़कियां तक दाखिला ले रही हैं, तो अब एक नया बहुमंजिला आधुनिक गर्ल्स हॉस्टल भी बन रहा है।
(एफटीआईआई के निदेशक भूपेन्द्र कैंथोला से मेरी विशेष बातचीत नवभारत टाइम्स 9 जनवरी 2021 के सभी संस्करणों में प्रकाशित हुई है)
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