ऑल इंडिया रेडियो के रिजेक्ट करने के बाद भी रवीन्द्र जैन ने रचा इतिहास
सुप्रसिद्द संगीतकार रवीन्द्र जैन के जन्म दिवस 28 फरवरी पर विशेष
- प्रदीप सरदाना
वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्म समीक्षक
अँखियों के झरोखों से, सुन साहिबा सुन, सजना है मुझे सजना के लिए, एक राधा एक मीरा, ले जाएँगे ले जाएँगे, दिल में तुम्हें बैठाके और ठंडे ठंडे ठंडे पानी से नहान चाहिए जैसे अनेक लोकप्रिय
गीतों के संगीतकार रवीन्द्र जैन यदि आज होते तो अपना 77 वां जन्म दिन मना रहे
होते।
फिल्म इंडस्ट्री में दादू
के नाम से मशहूर रवीन्द्र जैन को अपना जन्म दिन मनाना इतना अच्छा लगता था कि 27
फरवरी रात 12 बजते ही वह खुद ही हँसते हुए गाने लगते थे-‘’हैप्पी बर्थड़े टू मी’।‘’ यूं
भी रवीन्द्र जैन के प्रसंशक हर साल उनका जन्म दिन धूम धाम से मनाते रहे हैं। उनके 70
वें जन्म दिन पर फिल्म स्टार रेखा ने हेमामालिनी जैसे कई सितारों की मौजूदगी में कहा
था- मेरी उम्र भी दादू को लग जाये। बस आप मेरे सिर पर हाथ रख दीजिये, जिससे मुझे भी संगीत का कुछ ज्ञान मिल जाये।“
28 फरवरी 1944 को अलीगढ़ में जन्मे रवीन्द्र, सात भाइयों और एक बहन में चौथे नंबर पर थे। जब उनके पिता को पता लगा रवीन्द्र देख नहीं सकता तो उन्होंने उसे एक छोटा सा हारमोनियम लाकर दिया कि वह संगीत सीख सके। रवीन्द्र ने न सिर्फ संगीत सीखा बल्कि इतने गीत और साहित्य की भी रचना की जिसे देख उनकी बहुमुखी प्रतिभा का अंदाज़ सहज ही लगाया जा सकता है।
दादू ने मुंबई की फिल्म दुनिया में कदम रखा तो उन्हें फिल्म ‘काँच और हीरा’ में संगीत देने का मौका मिल गया। लेकिन उन्हें लोकप्रियता मिली 1973 में आई राजश्री की फिल्म ‘सौदागर’ से। उसके बाद तो चोर मचाये शोर, फकीरा, गीत गाता चल, चितचोर, दुल्हन वही जो पिया मन भाए, तपस्या, नदिया के पार, हिना और विवाह जैसी कितनी ही फिल्मों संगीत देकर दादू ने इतिहास लिख दिया।
जब रवीन्द्र जैन ने 1987
में रामानन्द सागर के सीरियल ‘रामायण’
में संगीत दिया तो इनकी लोकप्रियता विश्वव्यापी हो गयी। ‘रामायण’ में संगीत देने के साथ दादू ने ‘मंगल भवन अमंगल
हारी’ जैसी चौपाइयों आदि को गाया भी और ‘हम कथा सुनाते हैं’ जैसे गीतों की रचना भी की। उसके
बाद श्रीकृष्ण, साईबाबा और जय हनुमान जैसे और भी कई सीरियल
का संगीत रवीन्द्र जैन ने दिया।
रवीन्द्र जैन पत्नी दिव्या और पुत्र आयुष्मान के साथ
साथ ही इस महान संगीतकार ने कुछ पुस्तकें भी लिखीं। जिनमे उनके लिखे गीतों की एक पुस्तक ‘दिल की नज़र से’ है। जबकि दादू की लिखी और प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ‘रवीन्द्र रामायण’ तो राम कथा को उनके एक अलग नज़रिये से प्रस्तुत करती है।
रवीन्द्र जैन को उनके
संगीत के लिए जहां ‘पदमश्री’ और ‘आधारशिला’ जैसे सम्मान मिले। वहाँ फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ के लिए उन्हें फिल्मफेयर भी मिला।
यहाँ बता दें कि नेत्रहीन होते हुए भी अपने गीत संगीत से इतिहास रचने वाले रवीन्द्र जैन को ‘आल इंडिया रेडियो’ ने स्वर परीक्षा के दौरान रिजेक्ट कर दिया था। जबकि ‘सौदागार’ के दिल्ली प्रीमियर के दौरान 17 साल की दिव्या जैन, जब अपनी साहित्यकार माँ निर्मला जैन के साथ रवीन्द्र से मिली तो दिव्या ने उनका गीत सुन, तभी उनकी जीवन संगीनी बनने का फैसला ले लिया। तब दादू ने जो गीत सुनाया वह था –‘श्रंगार करो न करो, तुम यूं ही सुंदर हो, धरती पर रहती हो, पर गगन से ऊपर हो।
('लोकमत समाचार' में 28 फरवरी 2021 को प्रकाशित मेरा लेख कुछ इनपुट्स के साथ)
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