मेरी एक कविता 'जग की रीत' लोकमत समाचार साहित्य वार्षिकी में प्रकाशित
जग की रीत
यह कैसा जग है
जहाँ मौत पर भी
निमंत्रण भेजना पड़ता है
कि मेरे पिता मर गए हैं
आओ, मुझे अफ़सोस करो
यूँ तो हर आहट की आवाज़
उन्हें होती है
हमारी मुस्कराहट दूर से भी
उन्हें दिखती है
किन्तु हमारे करीब रहते भी
वो हमारी चीख तक
न सुन पाए
हमारे आंसू भी उन्हें
नज़र न आये
संभवतः तब उनकी नज़र
कमजोर होती है !
क्या सच दूसरे के दुःख के समय
उनकी आँखें कमजोर हो जाती हैं
उनके कान बहरे हो जाते हैं
जो किसी का बिलखना तक
नहीं देख-सुन पाते हैं
अभी तो यह मौत की रीत
सब पर गुजरती है
एक न एक दिन यह बिजली
सब पर गिरती है
यदि यह रीत
किसी किसी पर गुजरती
तो न जाने कितनी लाशें
अभी तक बिखरी पड़ी होतीं
कोई किसी को
कन्धा देने भी न आता
ज़नाजा वहीँ
पड़ा पड़ा सड़ जाता
वहीँ श्मशान
वहीँ कब्रिस्तान बन जाता
यूँ तो अभी भी
लोगों के दिल श्मशान हैं
जहाँ ईर्ष्या की लकड़ियों में
पर भावना जला करती है
यूँ तो अभी भी
लोगों के दिल कब्रिस्तान हैं
जहाँ स्वार्थ की मिटटी में
इंसानियत दफना करती है

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