‘हाथी मेरे साथी के 50 साल’ - काजोल ने ‘हाथी मेरे साथी’ देख तनूजा से 15 दिन बात नहीं की थी
- प्रदीप सरदाना
वरिष्ठ पत्रकार एवं
फिल्म-टीवी समीक्षक
फिल्में तो रोज बनती हैं।
लेकिन कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जिनकी सफलता, लोकप्रियता,यादें बरसों
बरसों बाद भी कम नहीं होतीं। ऐसी ही एक फिल्म है ‘हाथी मेरे
साथी’ जो 1 मई 1971 को रिलीज हुई थी लेकिन आज 50 बरस बाद भी
इस फिल्म का कोई और सानी नहीं है। यह उस बरस की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म थी।
जिसने सोवियत संघ सहित दुनिया के कई देशों में धूम मचा दी थी।
राजेश खन्ना, तनूजा, मदन पुरी, डेविड, जूनियर महमूद और सुजीत कुमार तो फिल्म के मुख्य कलाकार थे ही। लेकिन
फिल्म का एक और मुख्य कलाकार था हाथी रामू। यह पहली हिन्दी फिल्म थी जिसमें किसी
जानवर को इतनी बड़ी भूमिका मिली थी कि उसे फिल्म का दूसरा नायक कहा जाये तो गलत
नहीं होगा।
इस फिल्म का निर्माण दक्षिण फिल्मों के एक प्रसिद्द निर्माता चिनप्पा देवर ने किया था। इससे पहले दक्षिण के कई फ़िल्मकार हिन्दी की बहुत सी सफल फिल्में बना चुके थे। लेकिन ‘हाथी मेरे साथी’ जैसी शानदार सफलता किसी को नहीं मिली थी। तब इस फिल्म ने करीब 17 करोड़ रुपए कमाए थे, आज के हिसाब से करीब 400 करोड़। यह पटकथा लेखक सलीम-जावेद की जोड़ी की पहली फिल्म थी। जबकि फिल्म के संवाद इंद्रराज आनंद ने लिखे थे।
फिल्म में आनंद बख्शी के
गीतों को लक्ष्मी-प्यारे के संगीत में ऐसी लोकप्रियता मिली कि वे गीत अमर हो गए। ‘चल चल मेरे साथी,ओ मेरे हाथी’,’दिलबर जानी चली हवा मस्तानी’ जैसे किशोर-लता के मस्त
मस्त गीतों के साथ रफी का गाया गीत ‘नफरत की दुनिया को छोड़के’ तो रुला कर रख देता है। तनूजा ने अपनी यह फिल्म 1980 में 6 साल की बेटी
काजोल को दिखाई तो फिल्म देखने के बाद काजोल ने तनूजा से 15 दिन इसलिए बात नहीं कि
मम्मी आपने एलिफेंट को क्यों मार दिया?
चिनप्पा देवर ने जब अपनी एक तमिल फिल्म ‘देइवा चेयल’ को हिन्दी में ‘प्यार की दुनिया’ के नाम से बनाने का फैसला किया तो ‘आराधना’ से सुपर स्टार बन चुके राजेश खन्ना को हीरो लेने का फैसला लिया। खन्ना को इस फिल्म कि कहानी खास पसंद नहीं थी लेकिन तब वह कार्टर रोड पर अपना बंगला खरीदने के लिए लिए रुपए जुटा रहे थे। देवर ने जब उन्हें ढाई लाख रुपए एडवांस दे दिये तो वह उछल पड़े। तब राजेश ने लेखक सलीम से कहा कि इसकी कहानी को दमदार बना दो। सलीम ने अपने एक साथी जावेद के साथ मिलकर ‘प्यार कि दुनिया’ को ‘हाथी मेरे साथी’ बना दिया। जिसमें दिखाया कि हाथी जानवर होकर भी इन्सानों से कितना बेहतर है। जो अपने मालिक के लिए अपनी जान भी दे देता है।
('लोकमत समाचार' में 1 मई 2021 को
प्रकाशित मेरा लेख कुछ इनपुट्स के साथ)
प्रदीप सरदाना
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