सायरा बानो सच में ‘पड़ोसन’ थीं सुनील दत्त की

 

- प्रदीप सरदाना

वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्म समीक्षक 

मेरे सामने वाली खिड़की में एक चाँद का टुकड़ा रहता है। फिल्म पड़ोसन का यह गीत सभी ने सुना और देखा होगा। पर्दे पर फिल्म के नायक सुनील दत्त, पड़ोसन नायिका सायरा बानो को इंप्रेस करने के लिए यह गीत गाते हैं। सायरा बानो अपने घर की खिड़की से सुनील दत्त को उनके घर की खिड़की से यह गीत गाते हुए देखती हैं। जबकि गीत छिपकर किशोर कुमार गा रहे होते हैं। इस फिल्म का यह गीत और सिचुएशन पड़ोसन फिल्म की यूएसपी थी। लेकिन इससे भी दिलचस्प बात यह है कि फिल्म में ही नहीं, अपनी असली ज़िंदगी में भी सायरा बानो, सुनील दत्त की पड़ोसन ही थीं। दोनों रियल लाइफ में अपने अपने बंगले की खिड़की से एक दूसरे को आराम से देख सकते थे।

पड़ोसन एक ऐसी फिल्म है जिसकी गिनती देश की पाँच सर्वाधिक लोकप्रिय हास्य फिल्मों में होती है। हालांकि भारतीय सिनेमा की यह कालजयी फिल्म 1968 में प्रदर्शित हुई थी। लेकिन आधी सदी बीत जाने के बाद भी पड़ोसन का कोई और सानी नहीं है।

अभी पिछले सप्ताह 6 जून को ही सुनील दत्त का जन्म दिन था। सुनील दत्त तो इस दुनिया में रहे नहीं। लेकिन वह एक अच्छे अभिनेता होने के साथ एक अच्छे इंसान भी थे। मैं जब भी उनसे मिलने मुंबई में उनके घर जाता था तो मुझे लगता था मैं अपने किसी रिश्तेदार के घर जा रहा हूँ। उनकी सादगी और आदर सत्कार देखते ही बनता था। मुंबई में पाली हिल पर सुनील दत्त का वह घर आज भी है। हालांकि वहाँ अब फ्लेट्स बन गए हैं और उस जगह को इंपीरियल हाईट्स के नाम से जाना जाता है। सुनील दत्त के बेटे संजय और बेटी प्रिया यहीं रहते हैं। साथ ही सायरा बानो, दिलीप कुमार का बंगला भी उनके ठीक साथ है। यूं दिलीप साहब की तबीयत का हाल जानने या कभी कुछ और मौकों पर सायरा बानो से मेरी बातचीत अक्सर होती रहती है। लेकिन मैंने उनसे पहले कभी यह नहीं पूछा कि क्या 1967-68 में जब पड़ोसन बन रही थी, तब भी क्या आप दोनों अपने पाली हिल के इन्हीं घरों में रहते थे।

इस बार मैंने उनसे सुनील दत्त के जन्म दिन (6 जून) की पूर्व संध्या पर सुनील दत्त और पड़ोसन फिल्म को लेकर ही खास बातचीत की। हालांकि सायरा जी से जिस दिन मेरी बातचीत हुई उसके अगले ही दिन उन्हें दिलीप साहब को खराब तबीयत के कारण मुंबई के हिंदुजा अस्पताल में दाखिल कराना पड़ा।

सायरा बानो बताती हैं-‘’मैं पड़ोसन की शूटिंग के समय भी सच में उनकी पड़ोसन थी। आज भी हम पड़ोसी हैं। दत्त साहब के साथ हमारे हमेशा बहुत अच्छे ताल्लुकात रहे। बिलकुल परिवार की तरह। दत्त साहब तो अपने इस बंगले में हमारे से पहले आ गए थे। लेकिन जब पड़ोसन की शूटिंग शुरू हुई थी उससे पहले ही 1965-66 में मेरा भी यह बंगला तैयार हो गया था। मैं इसी बंगले में रहती थी। अपने घर की खिड्कियों और छत से हम एक दूसरे को, यहाँ तक घर के कमरों को आराम से देख सकते थे। उनके घर और मेरे घर के बीच में सिर्फ एक दीवार है।‘’

सायरा जी यह भी बताती हैं-‘’सुनील दत्त साहब के साथ फिल्म तो मैंने बहुत बाद में की। लेकिन मैं पहले से ही उन्हें अच्छे से जानती थी। दिलीप साहब और सुनील दत्त जी का भी करीबी रिश्ता था। यहाँ तक हमारी वालिदा नसीम बानो जी भी नर्गिस जी की पड़ोसन थीं।सुनील दत्त के साथ मुझे पड़ोसन से पहले भी दो तीन बार फिल्मों में काम करने के मौके मिले थे। फिल्म वक्त में भी बीआर चोपड़ा मुझे ही उनके साथ लेना चाहते थे। लेकिन डेट्स की समस्या के कारण वक्त नहीं कर सकी। इसलिए पड़ोसन ही उनके साथ मेरी पहली फिल्म थी। पड़ोसन में काम करने की कहानी भी काफी दिलचस्प है।‘’

‘’असल में जब यह फिल्म बनने वाली थी। तभी मेरी दिलीप साहब के साथ नयी नयी मंगनी हुई थी। कुछ ही दिन बाद हमारी शादी थी। इसलिए यह मुकर्रर था और मैं भी अपना मन बना चुकी थी कि 1966 के बाद अब कोई और फिल्म नहीं करूंगी। लेकिन पड़ोसन के निर्माता महमूद भाई ने दिलीप साहब से गुजारिश की, सायरा जी को आप यह एक फिल्म करने दीजिये। क्योंकि दत्त साहब फिल्म के हीरो थे। इसलिए दिलीप साहब ने मना नहीं किया और कहा ठीक है कर लें। तब पड़ोसन की शूटिंग शुरू हो गयी। फिल्म को करके बहुत अच्छा लगा। फिर फिल्म सुपर हिट साबित हुई।‘’

सायरा आगे बताती हैं- ‘’हालांकि दत्त साहब के साथ जब पड़ोसन की शूटिंग कर रही थी तो वह अक्सर मज़ाक में कहते थे, यह क्या कॉमेडियन बना दिया मुझे। हम दोनों को तो एंटोनी और क्लियोपैट्रा (शेक्सपियर की सुप्रसिद्द प्रेम गाथा के पात्र एंटोनी एंड क्लियोपैट्रा) जैसी कोई प्रेम कहानी वाली फिल्म करनी चाहिए थी, उसके लिए हम दोनों फिट होते। लेकिन मैं बहुत खुश हूँ कि सुनील दत्त जैसे बहुत ही नफीस और बेहतरीन इंसान के साथ पड़ोसन और फिर दत्त साहब की होम प्रॉडक्शन की फिल्म नहले पे दहला में भी मुझे काम करने का मौका मिला।‘’  

(सुप्रसिद्ध समाचार पत्र दैनिक भास्कर के प्रतिष्ठित रविवारीय परिशिष्ट रसरंग में 13 जून 2021 को प्रकाशित मेरा लेख )  

प्रदीप सरदाना    

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