राज कपूर ने ‘आवारा’ के लिए पिता को भी दिया था मेहनताना

प्रदीप सरदाना

वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्म विश्लेषक 

राज कपूर एक दिलकश अभिनेता होने के साथ लाजवाब फ़िल्मकार भी थे। एक ऐसे फ़िल्मकार जिन्होंने अपनी फिल्मों को भव्यता के ऐसे आयाम दिये जिसके लिए उन्हें द ग्रेट शोमैन कहा जाता था। आज राज कपूर को दुनिया से बिदा हुए 33 साल हो गए लेकिन उनके बाद देश का कोई और फ़िल्मकार ग्रेट शौमैन नहीं बन सका। हालांकि सुभाष घई और संजय लीला भंसाली सहित कुछ और फ़िल्मकारों ने भी अपनी फिल्मों में भव्यता के कई रंग बिखेरे। लेकिन ग्रेट शोमैन का तमगा किसी को न मिल सका।

बता दें राज कपूर को जिस फिल्म के बाद द ग्रेट शोमैन कहा जाने लगा वह फिल्म आवारा थी। सन 1951 में प्रदर्शित आवारा में राज कपूर के साथ नर्गिस नायिका थीं। इस फिल्म से पहले दोनों की जोड़ी बरसात फिल्म से हिट हो चुकी थी। लेकिन आवारा के बाद तो ये जोड़ी दुनिया भर में ऐसी लोकप्रिय  हुई कि जिसकी मिसाल आज भी दी जाती है। आवारा को शानदार बनाने के लिए राज कपूर ने एक ऐसा भव्य सेट लगाया, जहां स्वप्न दृश्य में घर आया मेरा परदेसी गीत फिल्मा कर राज कपूर ने इतिहास रच दिया। इससे पहले फिल्मों में किसी ने स्वप्न दृश्यों को फिल्मांकित नहीं किया था। आवारा फिल्म के इसी गीत को जब दर्शकों ने पर्दे पर देखा तो सभी मंत्रमुग्ध होकर वाह वाह कह उठे। इसी के बाद राज कपूर को ग्रेट शोमैन कहा जाने लगा।  

आवारा की बात चली है तो यह भी बता दें कि राज कपूर के पिता पृथ्वीराज कपूर भी इस फिल्म में उनके पिता की ही भूमिका में थे। यूं राज कपूर के दादा दीवान बसेश्वर नाथ कपूर भी आवारा में थे। दिलचस्प यह है कि राज कपूर ने आवारा में अभिनय करने के लिए अपने पिता पृथ्वीराज को भी मेहनताना दिया था। हालांकि पृथ्वीराज बेटे से कुछ लेना नहीं चाहते थे। लेकिन राज कपूर जानते थे कि उनके पिता अपने परिवार को चलाने के साथ, बहुतों की आर्थिक सहायता भी करते हैं। फिर जो भी धन राशि वह फिल्मों से कमाते हैं वे थिएटर पर खर्च देते हैं। इसलिए राज कपूर ने आवारा के लिए पृथ्वीराज को 50 हज़ार रुपए की फीस दी थी।

14 दिसंबर 1924 में जन्मे राज कपूर ने अपनी 64 बरस की ज़िंदगी में आग से लेकर राम तेरी गंगा मैली तक कुल 18 फिल्मों का निर्माण किया था। फिल्मों में अपने असाधारण योगदान के लिए राज कपूर को दादा दाहब फाल्के जैसा शीर्ष सम्मान भी मिला था। अपने इसी पुरस्कार को लेने वह 2 मई 1988 को दिल्ली आए थे। पुरस्कार समारोह के दौरान ही उनकी तबीयत ऐसी बिगड़ी कि एक महीने बाद 2 जून को वह चीर निंद्रा में चले गए। लेकिन उनकी फिल्में उन्हें सदा हमारे बीच बनाए हुए हैं।

(प्रसिद्ध समाचार पत्र ‘लोकमत समाचार’ में 2 जून 2021 को प्रकाशित मेरा लेख कुछ नए इनपुट्स के साथ )  

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