मेरा गाँव मेरा देश के 50 साल- धर्मेंद्र,आशा पारेख के साथ लक्ष्मी छाया के लिए भी याद की जाती है ‘मेरा गाँव मेरा देश’
- प्रदीप सरदाना
वरिष्ठ पत्रकार एवं
फिल्म समीक्षक
फ़िल्मकार राज खोसला की ‘मेरा गाँव मेरा देश’ एक ऐसी फिल्म है जिसने अपने प्रदर्शन के समय धूम मचा दी थी। फिल्म मेँ आनंद बक्शी के गीतों को लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने सदाबहार संगीत दिया। तभी फिल्म के सभी 5 गीत आज भी लोकप्रिय हैं- कुछ कहता है ये सावन, मार दिया जाये या छोड़ दिया जाये, सोना ले जा रे, हाय शरमाऊँ किस किस को बताऊँ और आया आया अटरिया पे कोई चोर।
फिल्म मेँ जहां धर्मेन्द्र,आशा पारेख नायक-नायिका हैं, वहाँ विनोद खन्ना खलनायक हैं। इस फिल्म की जब भी बात करेंगे तो
अभिनेत्री लक्ष्मी छाया को जरूर याद किया जाएगा। इस फिल्म से लक्ष्मी छाया, आशा पारेख से भी ज्यादा सुर्खियां ले गयी थीं। उनका अभिनय तो बढ़िया था
ही। साथ ही शायद यह एक अकेली ऐसी फिल्म होगी, जिसमेँ नायिका
के हिस्से तो दो गीत आए। लेकिन सहनायिका लक्ष्मी को तीन गीत दिये गए।
यह फिल्म जब 25 जून 1971 को रिलीज हुई तो एक आशंका थी कि यह पसंद की जाएगी या नहीं। क्योंकि फिल्म मेँ गाँव मेँ डाकूओं के आतंक का ऐसा विषय था जो आम हो चला था। लेकिन फिल्म की कहानी और पटकथा इतनी अच्छी थी कि यह फिल्म कालजयी बन गयी। फिल्म की शूटिंग राजस्थान के उदयपुर और उसके पास गाँव मेँ की गयी थी। फिल्म मेँ गाँव इतना खूबसूरत दिखाया है कि जिसने गाँव और गाँव की संस्कृति देखनी समझनी है तो वह यह फिल्म देख ले। जहां गाँव की भीनी मिट्टी की खुशबू है तो खेत-खलिहान, झील, झूले, मेले और सादगी व प्रेम भी है।
फिल्म मेँ उस दौर के
डाकूओं की परिस्थिति को भी दिखाया है जब चंबल के बाद राजस्थान मेँ डाकूओं के गाथा मशहूर
हो चली थी। फिल्म मेँ एक संवाद भी है-राजस्थान की दो चीज़ मशहूर हैं एक रेत और
दूसरे डाकू।
(प्रसिद्ध समाचार पत्र ‘लोकमत
समाचार’ में 25 जून 2021 को प्रकाशित
मेरा लेख )
- प्रदीप सरदाना
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