अभिनय सम्राट ही नहीं अभिनय का स्कूल भी थे दिलीप कुमार
- प्रदीप सरदाना
वरिष्ठ पत्रकार एवं
फिल्म समीक्षक
दिलीप कुमार जैसे दिग्गज
अभिनेता के निधन से सिनेमा के एक पूरे युग का अंत हो गया है। हालांकि यह सिनेमा से
जुड़े सभी लोगों के साथ दर्शकों का भी सौभाग्य है जिन्होंने दिलीप कुमार के इस युग
को अपनी उपस्थिती में देखा। फिर यह भी बड़ी बात है कि विधाता ने दिलीप कुमार को 98
बरस की लंबी ज़िंदगी दी। दिलीप कुमार की अंतिम फिल्म ‘किला’ 1998 में प्रदर्शित हुई थी। लेकिन ‘किला’ न तो सफल हो पायी और न ठीक से सभी जगह प्रदर्शित।
इसलिए उनकी 1991 में प्रदर्शित सुपर हिट फिल्म ‘सौदागर’ ही थी जिसमें दिलीप कुमार का अभिनय देख दर्शक झूम उठे थे। कहने का
अभिप्राय यह है कि दिलीप साहब पिछले करीब 30 बरसों से फिल्मों के रूपहले पर्दे से
दूर थे। लेकिन उनकी मौजूदगी ही फिल्म जगत और सिने दर्शकों को एक ऊर्जा देती रही।
यूं पिछले कुछ बरसों में
ऐसा कितनी बार हुआ कि दिलीप कुमार की तबीयत ज्यादा खराब होने पर,उन्हें कई दिन अस्पताल में गुजारने पड़े। उस दौरान यह डर कई बार सताता रहा
कि यह महान कलाकार कहीं हमसे जुदा तो नहीं हो जाएगा। लेकिन दिलीप साहब को ज़िंदगी
मिलती रही और हम सभी को खुशी कि दिलीप कुमार ठीक हो गए। लेकिन इस बार उस खुशी से
हम सब वंचित रह गए। हमने एक दिलकश अभिनेता और खूबसूरत इंसान को खो दिया। लेकिन
दिलीप कुमार अपने शानदार अभिनय से सजी अपनी फिल्मों की जो विरासत छोड़ गए हैं, उससे फिल्म उद्योग सदा मालामाल रहेगा।
मेरा सौभाग्य रहा कि पिछले करीब 45 बरसों में दिलीप कुमार जैसे शिखर के अभिनेता से मेरा कई बार मिलना हुआ। उनसे बातचीत हुई, उनकी कई फिल्मों की समीक्षा की। अब एक अरसे से दिलीप कुमार अपनी खराब सेहत के चलते बातचीत करने में असहाय से थे तो उनकी बेगम सायरा बानो से मैं दिलीप कुमार को लेकर अक्सर ढेरों बातें करता रहता था। दिलीप साहब ऐसी शख्सियत रहे जिनके बारे मे जितना जानो उतना और जानने को मन करता है।
सिर्फ मैं या उनके लाखों
करोड़ों प्रशंसक ही नहीं अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, मनोज कुमार, आमिर खान, शाहरुख
खान जैसे कितने ही जाने माने बड़े अभिनेता दिलीप कुमार के मुरीद रहे हैं। आज की
पीढ़ी के एक बड़े वर्ग ने दिलीप कुमार की फिल्मों को बहुत ज्यादा नहीं देखा और न
उन्हें इस बात का अहसास है कि दिलीप कुमार अपने दौर के कितने बड़े नायक थे, उनका रुतबा कैसा था। आज जब हम सदी के नायक की बात करते हैं तो अमिताभ बच्चन
का नाम सभी के मुख पर आ जाता है। इसमें कोई शक नहीं अमिताभ ने पिछले करीब 52 बरसों
से खुद को लगातार सिनेमा के शिखर पर जिस तरह बरकरार रखा है,
उससे वह ही सदी के महानायक हैं। इस उम्र में भी अमिताभ का अभिनय, उनकी लोकप्रियता और ऊर्जा का कोई और सानी नहीं। लेकिन दिलीप कुमार अभिनय
का वह स्कूल थे जिनको देख कई दिग्गज अभिनय सीखते रहे।
दिलीप कुमार जब 1944 में ‘ज्वार भाटा’ फिल्म से फिल्मों में आए थे तब उनसे
पहले केएल सैगल, मोती लाल और अशोक कुमार जैसे अभिनेता अपने
नाम और काम का डंका बजा चुके थे। दिलीप कुमार के आने के बाद भी अशोक कुमार अपनी
पारी बरसों बखूबी खेलते रहे। दिलीप कुमार के साथ राज कपूर और देव आनंद जैसे
अभिनेता तो इतने मशहूर हुए कि उस दौर में इनकी तिकड़ी सबसे सफल मानी जाती थी। साथ
ही जहां एक ओर सुनील दत्त, राजेन्द्र कुमार, राज कुमार, शम्मी कपूर, शशि
कपूर जैसे कई सितारों की फौज हिन्दी सिनेमा में मौजूद थी। वहाँ संजीव कुमार, धर्मेन्द्र, राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन जैसे कई
बेहतरीन नायक भी उनके सामने थे। लेकिन अभिनय के मामले में सर्वोच्च दिलीप कुमार ही
बने रहे।
अमिताभ बच्चन और शाहरुख
खान सहित कुछ और अभिनेताओं के अभिनय को देख यह भी कहा जाता रहा कि वे दिलीप कुमार की
नकल करते हैं। हालांकि मैं कहूँगा ये दिलीप की नकल नहीं करते ये दिलीप कुमार से
प्रभावित हैं। अमिताभ खुद भी कहते रहे हैं-‘’यदि कोई मेरे
अभिनय को दिलीप कुमार से प्रभावित या उन जैसा कहता है तो मेरे लिए इससे बड़ा कंप्लीमेंट
कुछ और हो ही नहीं सकता। लेकिन भारतीय सिनेमा के इतिहास का जब भी आकलन होगा तो उसे
दिलीप कुमार से पहले और दिलीप कुमार के बाद के हिसाब से ही देखा जाएगा।‘’
दिलीप कुमार ने 1944 से
लेकर 1998 तक के अपने 54 बरस के फिल्म करियर में कुल 56 हिन्दी फिल्मों और दो
बांग्ला फिल्मों में काम किया। इन फिल्मों के अतिरिक्त उनकी काला बाज़ार, साधू और शैतान, अनोखा मिलन और फिर कब मिलोगी जैसी 4
फिल्में वे भी है जिनमें वह मेहमान भूमिका में थे। लेकिन उनकी 56 हिन्दी फिल्मों
में 40 ऐसी फिल्में हैं जिनके माध्यम से दिलीप कुमार ने खुद को एक सशक्त अभिनेता
और सबसे बेहतर अभिनेता साबित किया। उनकी यादगार फिल्मों की यूं तो एक बड़ी सूची है।
लेकिन उनमें सर्वश्रेष्ठ दस फिल्मों की बात करें तो देवदास,
गंगा जमुना, मुगल ए आजम, मधुमती, नया दौर, राम और श्याम, सगीना, क्रांति, शक्ति और सौदागर के नाम तो सुगमता से लिए
जा सकते हैं। साथ ही शहीद, अंदाज़, शबनम, आन, दाग, पैगाम, लीडर, आज़ाद, आदमी, संघर्ष, अमर, दुनिया और कर्मा
जैसी कई और अच्छी फिल्में भी उनके खाते में हैं।
दिलीप कुमार ने जहां राम
और श्याम, दास्तान और किला जैसी फिल्मों में दोहरी भूमिका की वहाँ एक फिल्म ‘बैराग’ में तो वह एक सात ट्रिपल रोल में थे।
दिलीप कुमार की एक खास बात यह भी है कि उन्हें जहां फिल्मों के सर्वोच्च सम्मान ‘दादा साहब फाल्के’ से नवाजा गया वहाँ उन्हें पदम भूषण और पदम विभूषण जैसे बड़े सम्मान भी मिले। एक अभिनेता के रूप में सर्वाधिक 10 बार फिल्मफेयर पुरस्कार पाने का रिकॉर्ड भी दिलीप कुमार के नाम रहा। साथ ही उन्हें अपनी फिल्म ‘गंगा जमुना’ के लिए दूसरी सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला और भारत सरकार ने उनकी जीवन पर्यंत उपलब्धियों के लिए भी 2006 में विशेष रूप से सम्मानित किया। यहाँ तक पाकिस्तान सरकार ने भी उन्हें 1998 में अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘निशान ए इम्तियाज़ से नवाजा। यह पुरस्कार लेने के लिए दिलीप कुमार अपने दोस्त और पड़ोसी सुनील दत्त के साथ पाकिस्तान गए थे। साथ ही दिलीप कुमार जाते जाते, देश के सर्वाधिक आयु वाले फिल्म अभिनेता का रिकॉर्ड भी अपने नाम दर्ज करा गए हैं।
(प्रसिद्ध समाचार पत्र ‘हरिभूमि’ में 8 जुलाई 2021 के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित मेरा लेख कुछ इनपुट्स के साथ )
- प्रदीप सरदाना
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